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खीमाराम मेवाडा
सुमेरपुर में कांग्रेस 15 वर्षों का वनवास कैसे तोड़े? राजनीतिक विश्लेषण करने की जरूरत
2028 की जीत के लिए शीर्ष नेतृत्व को क्या फैसले लेने होंगे
तखतगढ़ 5 जुलाई (खीमाराम मेवाडा) कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ़ रही सुमेरपुर विधानसभा आज पार्टी के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है। वर्ष 2008 में मिली आखिरी जीत के बाद कांग्रेस लगातार 2013, 2018 और 2023 के विधानसभा चुनाव हार चुकी है। अब यदि कांग्रेस 2028 में इस सीट पर वापसी करना चाहती है, तो केवल सरकार विरोधी माहौल या परंपरागत वोट बैंक के भरोसे जीत हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए पार्टी को संगठनात्मक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बड़े एवं व्यावहारिक फैसले लेने होंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सुमेरपुर विधानसभा में पिछले तीन चुनावों के दौरान टिकट वितरण सबसे अधिक चर्चा का विषय रहा। स्थानीय स्तर पर यह धारणा बनी कि प्रत्याशी चयन में कई बार विधानसभा के सामाजिक एवं जातीय समीकरणों तथा स्थानीय स्वीकार्यता की अपेक्षा अन्य राजनीतिक कारक अधिक प्रभावी रहे। ऐसे में पार्टी अपने पारंपरिक मतदाताओं को पूरी तरह एकजुट करने के साथ-साथ नए मतदाताओं को भी जोड़ने में अपेक्षित सफलता नहीं हासिल कर सकी।
सुमेरपुर विधानसभा का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां जातीय और सामाजिक समीकरण चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारकों में रहे हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस 2028 में वापसी का सपना देख रही है, तो शीर्ष नेतृत्व को सबसे पहले जीत की संभावना को प्राथमिकता देनी होगी। प्रत्याशी चयन में केवल निष्ठा या गुटीय संतुलन नहीं, बल्कि स्थानीय जनस्वीकार्यता, सामाजिक प्रतिनिधित्व, सक्रियता और जीतने की क्षमता जैसे पहलुओं को भी बराबर महत्व देना होगा।
कांग्रेस के लिए दूसरी सबसे बड़ी चुनौती संगठन को फिर से जीवंत बनाना है। कई वर्षों की लगातार हार के बाद कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। यदि बूथ स्तर तक संगठन सक्रिय नहीं होगा, तो मजबूत प्रत्याशी भी चुनावी बढ़त बनाने में कठिनाई महसूस कर सकता है। इसलिए शीर्ष नेतृत्व को चुनाव से काफी पहले संगठनात्मक पुनर्गठन, सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी और नियमित जनसंपर्क अभियान शुरू करने होंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि केवल कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक के भरोसे जीत संभव नहीं है। पार्टी को ऐसी रणनीति बनानी होगी जिससे भाजपा के पारंपरिक मतदाताओं के एक हिस्से, युवाओं, प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं और स्थानीय मुद्दों से प्रभावित वर्गों तक भी प्रभावी पहुंच बनाई जा सके। दूसरे शब्दों में, कांग्रेस को केवल अपने वोट बचाने की नहीं, बल्कि विपक्ष के वोटों में भी राजनीतिक सेंध लगाने की रणनीति पर काम करना होगा।
स्थानीय मुद्दों को भी चुनाव के केंद्र में लाना होगा। किसानों, युवाओं, रोजगार, पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास जैसे विषयों पर निरंतर जनआंदोलन और जनसंपर्क कांग्रेस को फिर से जनता के बीच मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि टिकट की घोषणा अंतिम समय में करने के बजाय समय रहते प्रत्याशी घोषित किया जाए, ताकि वह पूरे विधानसभा क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क कर सके और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित कर सके।
हालांकि चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं जीते जाते। मतदाता विकास, नेतृत्व, संगठन, प्रत्याशी की छवि और समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों सहित अनेक कारकों को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं। इसलिए यदि कांग्रेस 2028 में जीत का रास्ता तलाशना चाहती है, तो उसे इन सभी पहलुओं पर संतुलित रणनीति अपनानी होगी।
सुमेरपुर की जनता ने अपने छह दशक के चुनावी इतिहास में कई बार सत्ता परिवर्तन कर यह साबित किया है कि यहां कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं है। यही कारण है कि 2028 का चुनाव कांग्रेस के लिए केवल एक और चुनाव नहीं, बल्कि 15 वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक वनवास को समाप्त करने की सबसे बड़ी परीक्षा माना जाएगा। यदि शीर्ष नेतृत्व स्थानीय परिस्थितियों को समझते हुए समय पर सही राजनीतिक निर्णय लेता है, संगठन को मजबूत करता है और व्यापक जनस्वीकार्यता वाले प्रत्याशी पर दांव लगाता है, तो कांग्रेस के लिए वापसी की संभावनाएं अवश्य बन सकती हैं। अंतिम फैसला, हमेशा की तरह, सुमेरपुर की जनता के हाथ में होगा।

