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सिरोही-पिंडवाड़ा ब्लॉक में सिरोही नस्ल की बकरियों के संरक्षण और उन्नयन के लिए ‘सामुदायिक नस्ल सुधार कार्यक्रम’ संचालित किया जा रहा है। सेंटर फॉर माइक्रो फाइनेंस (सीएमएफ) संस्था अब तक 710 परिवारों की 5500 से अधिक बकरियों और बकरों को डिजिटल पहचान से जोड़ चुकी है।
सीएमएफ की हेमलता रावत ने बताया कि यह कार्यक्रम मालप, कुंडाल, घरट, थंडीबेरी, पहाड़कला, तेलपीखेड़ा, दरबारीखेड़ा और मालेरा सहित 8 गांवों में संचालित है। यहां 3 ब्रीडिंग क्लस्टर विकसित किए गए हैं, जहां चयनित उच्च गुणवत्ता वाले बकरों के माध्यम से संगठित नस्ल सुधार किया जा रहा है। प्रत्येक बकरी और बकरे के कान में 6 अंकों का यूनिक आईडी टैग लगाया गया है। इस आईडी के आधार पर स्वास्थ्य, टीकाकरण, वजन, प्रजनन और प्रसव संबंधी सभी विवरण सॉफ्टवेयर में दर्ज किए जाते हैं। हर तीन महीने में बकरी पालकों को सॉफ्टवेयर आधारित प्रगति रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक ग्रेडिंग वाले बकरों को प्रजनन (बीज) के लिए चयनित किया जाता है, जबकि कम गुणवत्ता वाले बकरों का बधियाकरण (कैस्ट्रेशन) कर विपणन किया जाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से श्रेष्ठ नस्ल विकास के साथ आंतरिक प्रजनन पर भी रोक लग रही है। किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से बकरी पालन के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि वे बेहतर नस्ल चयन कर अधिक मुनाफा कमा सकें।
सिरोही नस्ल की बकरियां मुख्य रूप से भूरे और पीले रंग की होती हैं, जिन पर हल्के चकत्ते पाए जाते हैं। यह नस्ल पहाड़ी और शुष्क क्षेत्रों के लिए अनुकूल मानी जाती है। सीएमएफ ट्रस्ट वर्ष 2016 से इस नस्ल के संरक्षण और उन्नयन पर कार्य कर रहा है। इस पहल से बकरी पालन पारंपरिक गतिविधि से आगे बढ़कर एक संगठित, लाभकारी और महिला-नेतृत्व वाला आजीविका मॉडल बनता जा रहा है। यह कार्यक्रम नस्ल सुधार के साथ ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।

