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खीमाराम मेवाडा
जालोर-जालोर के आहोर क्षेत्र में 4 गांवों की सरहद में पहाड़ी क्षेत्र में स्वीकृत 34 खनन पट्टों के विरोध में ग्रामीणों ने कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर पट्टे निरस्त करने की मांग की। उनका कहना है कि खनन और ब्लास्टिंग से करीब 4-5 हजार बीघा कृषि भूमि, 500 ट्यूबवेल, 20-25 तालाब, पशुधन और पहाड़ी पर स्थित वांकड़ माताजी मंदिर प्रभावित हो सकता है।
ग्रामीणों ने ज्ञापन में बताया कि संबंधित पहाड़ी क्षेत्र आसपास के पशुओं के चरने का प्रमुख स्थान है। यहां खनन शुरू होने पर पशुओं के लिए चरागाह की समस्या पैदा हो जाएगी। पहाड़ी के आसपास के खेतों में करीब 500 ट्यूबवेल हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इन ट्यूबवेल के भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत यही पहाड़ी क्षेत्र है। ऐसे में खनन से भूजल स्तर प्रभावित हुआ तो खेती की जमीन के बंजर होने की आशंका है।
गांवों के पास होने से ब्लास्टिंग का भी खतरा
ग्रामीणों के मुताबिक आसपास के गांव पहाड़ी से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए हैं। खनन के दौरान ब्लास्टिंग होने पर मकानों में दरारें आने के साथ विद्यालय और मंदिरों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। इसके अलावा खनन से उड़ने वाली धूल से ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की बात कही गई है।
पहाड़ी के बीच मंदिर, श्रद्धालुओं की आस्था का हवाला
ग्रामीणों ने बताया कि पहाड़ी के बीच वांकड़ माताजी (जोगमाया) का मंदिर स्थित है, जहां रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर से लाखों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। ऐसे में खनन गतिविधियों से धार्मिक स्थल प्रभावित होने की भी चिंता है।
20-25 तालाबों में पहाड़ी से आता है पानी
ज्ञापन में बताया गया कि तोडमी, रातानाडा, रेवड़ा कल्ला, बांकली, घाना और रामा सहित आसपास के क्षेत्र में करीब 20 से 25 छोटे-बड़े तालाब हैं। इन तालाबों में पहाड़ी से बहकर आने वाला पानी एकत्र होता है। इन जलस्रोतों से ग्रामीणों और पशुओं की पानी की जरूरत भी पूरी होती है।
ग्रामीणों के अनुसार आसपास के गांवों में करीब 20 से 22 हजार की आबादी और लगभग 5 हजार पशुधन है। उनका कहना है कि खनन गतिविधियों से इतनी बड़ी आबादी और पशुधन प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
4-5 हजार बीघा कृषि भूमि पर असर की आशंका
ग्रामीणों ने बताया कि पहाड़ी के आसपास करीब 4 से 5 हजार बीघा कृषि भूमि है। करीब चार वर्ष पहले वाटरशेड के तहत क्षेत्र में लगभग 15-16 करोड़ रुपए की लागत से छोटे तालाब, एनिकट और जल संरक्षण से जुड़े अन्य कार्य करवाए गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि खनन शुरू होने से इन जल संरक्षण संरचनाओं और भूजल रिचार्ज व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से क्षेत्र की भौगोलिक, पर्यावरणीय और धार्मिक परिस्थितियों को देखते हुए स्वीकृत सभी 34 खनन पट्टों की जांच कराने की मांग की है। साथ ही इन्हें निरस्त करने और क्षेत्र में खनन गतिविधियां शुरू नहीं होने देने की मांग की है।


