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सिरोही-भाद्रपद कृष्ण षष्ठी पर आज ऊबछठ का व्रत है। इस दिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं खड़े होकर चंद्रमौलेश्वर के दर्शन करती हैं। ज्योतिष एवं वास्तुविद आचार्य प्रदीप दवे के अनुसार, इस बार पंचमी तिथि क्षय होने से ऊबछठ 14 अगस्त को मनाया जाएगा।
व्रत का विशेष महत्व है। विवाहित महिलाएं पति-पत्नी का जोड़ा अखंड रखने के लिए व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं शिव समान वर की प्राप्ति के लिए व्रत करती हैं। व्रती महिलाएं दिनभर उपवास रखेंगी। संध्या समय में स्नान के बाद व्रतियों की तपस्या शुरू होगी। सभी खड़े होकर चंद्रमौलेश्वर के दर्शन की प्रतीक्षा करेंगी। इस दौरान मंदिरों में भी दर्शन के लिए जाएंगी। चंद्रोदय से चंद्र दर्शन तक यह क्रम जारी रहेगा।
भगवान शिव ने पार्वती को बनाया अर्धांगिनी
शिव पुराण के अनुसार, यह व्रत भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह से जुड़ा है। कजली तीज का यह अगला चरण है। मान्यता है कि पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। कजली तीज के दिन शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।
पार्वती को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करते ही पूरी सृष्टि में खुशी की लहर दौड़ गई। ढोल-नगाड़े बजने लगे, देवता पुष्प वर्षा करने लगे, मिठाइयां बंटने लगी, बधाई देने वालों का तांता लगने लगा। पूरा कैलाशधाम रोशनी से सजाया गया तथा भोजन व लंगर का कार्यक्रम चलता रहा। इस कारण भगवान शिव तीन दिन व्यस्त रहे और पार्वती से बातचीत नहीं हो सकी। जिससे पार्वती विहल हो उठी। वे तीन दिन परेशान रही। इसके बाद षष्ठी का दिन भी अस्त व्यस्त बीता। शाम को संध्या समय पार्वती को विचार आया कि रात को चंद्रोदय होने के साथ भगवान शिव अपने आप प्रकट हो जायेंगे, क्योंकि चन्द्र का वास भगवान की शिखा में है और चन्द्र दर्शन होते ही भगवान चंद्रशेखर के दर्शन स्वतः हो जायेंगे। यह सोचकर पार्वती ने संध्या समय में स्नानादि से पवित्र होकर एक पांव पर खड़े रहकर चंद्रोदय की प्रतीक्षा करने लगी तथा जब चंद्रोदय हुआ तब भगवान चंद्रशेखर के दर्शन किये, पूजा अर्चना की और अखण्ड जोड़े की कामना की।
भगवान चंद्रशेखर के दर्शन करने की प्रतीक्षा में पार्वती द्वारा एक पांव पर खड़े रह कर दर्शन करने की वजह से आज भी महिलाएं व कुँआरी कन्याएं संध्या समय में स्नानादि से पवित्र होकर खड़े रहकर भगवान चंद्रमौलेश्वर के दर्शन व पूजन कर अपना पति-पत्नी का जोड़ा अखण्ड रखने तथा कुँआरी कन्याएं शिव समान वर देने का वचन प्राप्त कर व्रत-उपवास खोलती है।
पति की लम्बी आयु की कामना नहीं कर, जोड़ा अखण्ड रहने की कामना करें
आचार्य प्रदीप दवे ने श्रीमद्भागवत कथा में आये वृतांत के अनुसार बताया कि- एक बार पार्वती ने अपने पति भगवान शिव से पूछा कि आपके गले में मुंड-माला है। इन मुंड-माला में सभी मुंड महिलाओं के है तो ये महिलाएं कौन है ? तब भगवान शिव ने कहा कि ये सभी मुंड तेरे ही है। पार्वती द्वारा कारण पूछने पर भगवान ने कारण बताया कि तेरी जन्म-मृत्यु होती रही तथा जब-जब तेरी मृत्यु हुई तब-तब तेरा मुंड काटकर मुंड-माला में पिरोता रहा।
फिर पार्वती ने भगवान शिव को कहा कि भगवान मैं आपकी सारी बात मान लेती हूँ, परंतु आप यह बतायें कि मेरी तो जन्म-मृत्यु होती रही, लेकिन आपकी जन्म-मृत्यु क्यों नहीं हुई ? तब भगवान शिव ने कहा कि तुम कामना ही ऐसी करती हो कि “मेरा सुहाग अमर रखना” या “मेरे पति की आयु लम्बी करना” आदि फलस्वरूप तुम्हारा सुहाग (मैं)
तो अमर हो गया और तुम्हारी मृत्यु होती रही। तब भगवान ने कहा कि तुम ऐसी गलत कामना क्यों करती हो ? तुम तो आज से ऐसी कामना करो कि “हमारी जोड़ी अमर रखना” या “हमारा जोड़ा अखण्ड रखना”। पार्वती को अपनी गलती समझ में आई और भगवान शिव की बात मानकर अपना जोड़ा अखण्ड रहने की कामना की। फलस्वरूप आज भी शिव-पार्वती का जोड़ा अखण्ड है। इसलिए पति की लम्बी आयु की कामना नहीं कर, पति-पत्नी का जोड़ा अखण्ड रहने की कामना करनी चाहिए और इसी कामना के साथ भगवान चंद्रशेखर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
भगवान शिव से वचन लेती है महिलाएं व कुंआरी कन्याएं
व्रती महिलाएं व कुँआरी कन्याएं भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर भगवान शिव से यह वचन लेती है कि हे भगवान जिस प्रकार आपका शिव-पार्वती का जोड़ा अखण्ड रहा है। उसी प्रकार हमारा जोड़ा भी अखण्ड रखना तथा कुँआरी कन्याएं शिव समान वर देने का वचन प्राप्त कर खड़े रहने का अनशन तोड़ कर आसन पर बैठ जाती है और व्रत खोलती है तथा भगवान के प्रति आभार व्यक्त करतीं हैं।