• May 6, 2026

कोमल कुमारी बनीं साध्वी कृपांशी रेखा श्रीजी: रेवदर के भटाना में आयोजित हुआ भव्य दीक्षा महोत्सव

PALI SIROHI ONLINE

सिरोही-रेवदर तहसील के भटाना नगर में बुधवार सुबह भव्य दीक्षा महोत्सव में मुमुक्षु कोमल कुमारी परमार ने सांसारिक जीवन त्यागकर संयम पथ अपनाया। आचार्यदेव रविरत्नसूरीश्वरजी द्वारा रजोहरण (ओघा) प्रदान करने के साथ ही वे साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी के नाम से जानी जाने लगीं। विशाल जनसमुदाय की मौजूदगी में आयोजित इस समारोह में श्रद्धा, उत्साह और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

नाम घोषणा पर गूंजा पंडाल

दीक्षा के दौरान नूतन साध्वी के नाम की घोषणा उनकी सांसारिक बुआ रसीला बेन मिलापचंद, उर्मिला बेन भंवरलाल और संगीता बेन शशिकान्त ने ‘चढ़ावा’ लेकर की। जैसे ही धर्मसभा में “साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी” नाम का उद्घोष हुआ, पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट और जय-जयकार से गूंज उठा। भक्तों ने अक्षतों से उनका ‘वधामणा’ कर अभिनंदन किया।सुबह 3:15 बजे घर से शुरू हुआ संयम का सफर

दीक्षा से पूर्व कोमल कुमारी सुबह 3:15 बजे अपने निवास से रवाना होकर मंदिर पहुंचीं। वहां उन्होंने भगवान शांतिनाथ की अंतिम पूजा-अर्चना की और युगादि संयम वाटिका में प्रवेश किया। माता मंजुला बेन, पिता पुखराज परमार और अन्य परिजनों ने ‘विजयी भव’ का आशीर्वाद देकर उन्हें संयम मार्ग पर विदा किया।

मंगल विधियों के बीच हुई दीक्षा प्रक्रिया

गुरु भगवंतों के पूजन के बाद दीक्षा की मंगल क्रियाएं प्रारंभहुईं। कोमल बेन ने भगवान के नाल के समक्ष तीन प्रदक्षिणाएं कीं। रजोहरण ग्रहण करने से पहले गुरु मुख से ‘मय मुंडावेहं, मम पव्वावेह, मम बेसं समप्पेह’ के तीन आदेश मांगे गए। शुभमुहूर्त में रजोहरण अर्पित होते ही मुमुक्षु आनंदित होकर झूम उठीं और मौजूद श्रद्धालुओं ने अक्षतों से बधाई दी।

भोर में भी भरा रहा श्रद्धालुओं का सैलाब

सुबह का समय होने के बावजूद दीक्षा स्थल पर भारी भीड़ उमड़ी। पूरा मंडप श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा। इस पावन अवसर पर आचार्य भाग्येशसूरीश्वरजी म.सा. और शीलरत्नसूरीश्वरजी म.सा. भी मौजूद रहे। ग्रामवासी, श्रेष्ठिवर्ग और बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं समारोह के साक्षी बने।भटाना में नौवीं दीक्षा, 498वीं शिष्या बनीं

भटाना गांव में यह नौवीं दीक्षा रही।

नूतन साध्वी कृपांशी रेखाश्रीजी, प्रवर्तिनी साध्वीजी पुण्यरेखाश्रीजी म.सा. के परिवार में शामिल होने वाली 498वीं शिष्या बनीं, जिससे पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का माहौल बना रहा।

दीक्षा का अर्थः परमात्मा के प्रति समर्पण – आचार्य भाग्येशसूरीजी

दीक्षा महोत्सव में आचार्य भगवंत भाग्येशसूरीश्वरजी महाराजा ने अपने उद्बोधन में कहा कि दीक्षा का अर्थ परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण और संयम मार्ग को अपनाना है। उन्होंने बताया कि कोमल कुमारी के भीतर वैराग्य भाव पहले से ही विद्यमान था, जिसके चलते उन्होंने भौतिक जीवन की चकाचौंध छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग को चुना।

रजोहरण को बताया परमात्मा का प्रसाद

आचार्य ने रजोहरण (ओघा) की महत्ता बताते हुए कहा कि यह दीक्षार्थी के लिए परमात्मा का प्रसाद होता है। इसे प्राप्त करते ही साधक के रोम-रोम में आनंद का संचार हो जाता है और वह पंच महाव्रत के प्रति पूर्ण समर्पित हो जाता है।परिजनों ने अर्पित किए संयम जीवन के उपकरण

दीक्षा के पश्चात साध्वी बनने के बाद उपयोग में आने वाले उपकरणों का ‘चढ़ावा’ बोलकर परिवारजनों ने ‘उपकरण वोहराने’ का लाभ लिया और आवश्यक वस्तुएं अर्पित कीं। अब नूतन साध्वी इन्हीं उपकरणों के साथ संयम जीवन व्यतीत करेंगी।

आयोजकों ने जताया आभार

श्री जैन संघ भटाना के अध्यक्ष पुखराज भबुतमलजी एवं दीक्षा महोत्सव के आयोजक पुखराजजी चुन्नीलालजी परमार परिवार ने समारोह में पधारे सभी श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सभी के आगमन से दीक्षा महोत्सव की शोभा बढ़ी और दीक्षार्थी का मनोबल भी ऊंचा हुआ।

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