• April 25, 2026

करणसिंह उचियारड़ा आशापुरा माता मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष रहेंगे, अगली सुनवाई 5 मई को

PALI SIROHI ONLINE

पाली-नाडोल स्थित प्रसिद्ध आशापुरा माता मंदिर ट्रस्ट में चल रहे विवाद करणसिंह उचियारड़ा बनाम देवस्थान विभाग व अन्य में जिला न्यायालय ने एक अहम आदेश पारित किया है। न्यायालय ने विपक्षियों द्वारा नवगठित कार्यकारिणी के कार्यों पर अस्थायी रोक लगाते हुए स्पष्ट किया कि करणसिंह उचियारड़ा की अध्यक्षता वाली पूर्व निर्वाचित कार्यकारिणी ही ट्रस्ट का कार्यभार संभालेगी। अदालत ने मामले में दोनों पक्षों को अगली पेशी तक यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

अगली सुनवाई 5 मई 2026 को होगी। न्यायालय द्वारा संरक्षक महाराज एवं कुंवर सहित सभी संरक्षक गण, कथित गठित कार्यकारिणी, सभी प्रतिनिधिसभा के सदस्यों, आपत्तिकर्ताओं, राज्य सरकार, देवस्थान विभाग, तहसीलदार, ट्रस्ट सहित 38 पक्षकारों को नोटिस जारी कर 10 दिवस के बाद सुनवाई कर आदेश पारित किए। न्यायालय ने माना कि यदि प्रार्थी को अंतरिम राहत नहीं दी, तो वाद प्रस्तुत करने का मूल उद्देश्य निष्फल हो जाएगा। करणसिंह उचियारड़ा ने न्यायालय को बताया कि वे 13 अगस्त 2028 तक के लिएट्रस्ट के निर्वाचित अध्यक्ष हैं। देवस्थान विभाग 21 जनवरी 2025 को कार्यकारिणी को इंद्राज कर चुका है। आरोप है कि अप्रार्थीगण ने 28 दिसंबर 2025 को पुरानी कार्यकारिणी भंग कर 9 मार्च 2026 को चुनाव करवाकर नई कार्यकारिणी का गठन कर लिया। करणसिंह उचियारड़ा के पक्ष ने इसे ट्रस्ट के संविधान के विपरीत बताया और नई कार्यकारिणी द्वारा बैंक या सरकारी विभाग में किसी कार्यवाही पर रोक की मांग की। प्रार्थी के अधिवक्ता पीएम जोशी ने तर्क दिया कि विपक्षियों को ट्रस्ट के सुचारू कार्य में बाधा डालने से रोका जाए। वहीं अप्रार्थी संख्या 2 के अधिवक्ता महेन्द्र व्यास की ओर से दलील दी कि नई कार्यकारिणी का गठन विधि अनुसार हुआ है।

उन्होंने कहा कि नई कार्यकारिणी का इंद्राज देवस्थान विभाग में विचाराधीन है, वादी का वाद चलने योग्य नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।

अधिवक्ता प्रवीण व्यास ने करणसिंह के पक्ष का समर्थन किया। उचियारड़ा पक्ष के अधिवक्ता पीएम जोशी ने बताया कि ट्रस्ट में सिरोही राजघराने को मुख्य संरक्षक के पद पर आसीन किया है। वर्तमान संरक्षक की अस्वस्थता का फायदा उठाते हुए कुछ लोगों ने उचियारड़ा द्वारा कराए जा रहे विकास कार्यों से ईर्ष्या के चलते पाटवी पुत्र के माध्यम से दखल देना शुरू कर दिया था। जब उनकी मनमानी नहीं चली, तो अवैध रूप से कार्यकारिणी भंग करने और मनमाने तरीके से चुनाव प्रक्रिया दिखाकर प्रतिनिधियों को मतदान से वंचित करनेका ड्रामा रचा। उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद जब मामला पाली सिविल न्यायालय पहुंचा तो कोर्ट ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी कर रोक लगा दी।

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