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जीवाणा-निकटवर्ती सांगाणा गांव में गुरुवार को वर्षों – पुरानी समंदर हिलोरा की परंपरा निभाई। इस अवसर पर करीब 30 भाई-बहनों के जोड़े इस रूम में शामिल हुए। सुबह से ही गांव का माहौल पारंपरिक रंग में रंगा नजर आया।
महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजधजकर समूह में गीत गाती हुई घरों से तालाब की ओर रवाना हुई। तालाब पर पहुंचकर महिलाओं ने सामूहिक रूप से ओ महारा सासुजी समंदरियो हिलोरा खाए, वीरा दल बादल उजले… जैसे लोकगीतों का सुर में संगान किया। लोकगीतों कीमधुर धुनों पर महिलाएं थिरक उठीं और चारों अनुसार, तालाब के बीच खड़े होकर भाई बहनों ने मटका पकड़कर समंदर हिलोरा की क्रिया संफन की गई। इसके बाद भाइयों ने अपनी बहनों को चुनरी ओढ़ई, जो प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। साथ ही उन्होंने बहनों को उपहार भेंट किए और एक-दूसरे को तालाब का जल पिलाया। यह जल पिलाने की परंपरा भाई-बहन के स्नेह और आपसी विश्वास को मजबूत करने के भाव से निभाई जाती है। इस अवसर पर भाइयों ने अपनी बहनों के ससुराल में सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की
गांव के बच्चों और युवाओं नेभी उत्साहपूर्वक रस्म में भाग लिया
गांव की बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि समंदर हिलोरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते की गहराई, आपसी स्नेह और पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक है। इस परंपरा में तालाब का विशेष महत्व है, क्योंकि इसे जीवन, शुद्धता और आशीर्वाद का स्रोत माना जाता है। बच्चों और युवाओं ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाएं पारंपरिक गीतों के साथ झूमती गाती रहीं। पुरुषों ने व्यवस्थाओं में सहयोग दिया।
जीवाणा. लुम्बा की ढाणी की सेदरी नाडी पर कलबी समाज की महिलाएं मटका लेकर पहुंची।
जीवाणा। लुम्बा की ढाणी की सेदरी नाडी में कलबी समाज ने समंदर हिलोरने की पौराणिक रस्म निभाई। भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता को समर्पित इस परंपरा में भाइयों ने बहनों को नाड़ी का जल पिलाया। इस दौरान चुदड़ी ओढ़ाकर जीवनभर रक्षा का वचन दिया। महिलाओं ने भजन और लोकगीतों की प्रस्तुतियां दीं। लोगों ने बताया कि समंदर हिलोरना एक धार्मिक और सामाजिक रस्म है। इसे स्थानीय भाषा में मंथन भी कहा जाता है। मान्यता है कि यह परंपरा समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी है। जल को देवतुल्य मानकर बहनों को पिलाना, भाई की ओर से उनके कष्ट हरने का प्रतीक माना जाता है। इस मौके पर संत राजाराम, युवा जागृति मंच के प्रदेश संगठन मंत्री दूदाराम चौधरी, हरचंदराम, सांवलाराम, अजबाराम, जेताराम, हड़मताराम और लादाराम समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।