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बाली उपखण्ड के चामुंडेरी ग्राम में महिलाओं ने गाय बछड़े की पूजा कर संतान की लंबी उम्र, सुखी जीवन और सुरक्षा की कामना का लोकपर्व बच्छ-बारस (गोवत्स द्वादशी) श्रद्धा के साथ मनाया।
इस अवसर पर माताएं दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखेंगी और बछड़े वाली गाय की पूजा-अर्चना कर संतान की सुख-समृद्धि व सुरक्षा की कामना की।
गौरतलब है कि बच्छ-बारस पर उसी गाय की पूजा की जाती है, जिसके साथ उसका बछड़ा हो। इसके पीछे मां और संतान के बीच ममता और सुरक्षा के भाव को माना जाता है। पूजा के दौरान माताएं गौ-माता से अपनी संतान की सभी संकटों से रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
बच्छ-बारस की परंपरा द्वापर युग से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि जब बालक श्रीकृष्ण गाय चराने जंगल जाते थे, तब मां यशोदा ने उनकी सुरक्षा की कामना से बछड़े वाली गाय का पूजन किया था। इसके बाद से यह परंपरा चली आ रही है।
पर्व के दिन घर में चाकू या किसी धारदार वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया जाता। बिना चाकू से काटी गई सब्जियां बनाई जाती हैं। पूजा के बाद व्रती महिलाएं बाजरे की रोटी (सोगरा) और अंकुरित अनाज जैसे चना, मोठ आदि ग्रहण कर व्रत खोलती हैं। इस दिन गाय के दूध, दही, पनीर और घी का सेवन नहीं किया जाता।
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