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बांता-बांता गांव के बीच 150 फीट ऊंची भाखरी पहाड़ी पर शिला के नीचे विराजित है मां चामुंडा का धाम। श्रावण की चौदस पर गुरुवार को हर वर्ष की तरह मां चामुंडा का शृंगार किया जाएगा। 250 सीढ़ीनुमा पगडंडियों की चढ़ाई के बाद श्रद्धालु मां के दर्शन करेंगे। यहां नौ दुर्गा शक्ति पीठ पाषाण रूप में विराजित हैं। मान्यताओं के अनुसार बांता को अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा। प्रारंभिक दौर में भाखरी वाला, बाद में आसपास बारह ढाणियां बसने के कारण बारह ढाणियों से जोड़ा।
गांव में चारभुजानाथ, रणछोड़ भगवान, मां हिंगलाज-सेहवाज, महादेव और मातेश्वरी सहितकई प्रमुख देवस्थलों की मान्यता रही है। इन्हीं धार्मिक आस्थाओं के कारण इसे बद्रीनाथ नाम से पुकारने की बात स्थानीय लोग बताते हैं। 1857 की क्रांति के दौरान क्षेत्र के ग्रामीणों ने अंग्रेजी सैनिकों का विरोध किया था। पहाड़ी के पत्थरों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अंग्रेजों को खदेड़ा। पत्थरों को स्थानीय भाषा में भाटा कहने के कारण गांव के नाम का संबंध भाटा से जोड़ा जाता है। इसी अपभ्रंश से गांव का नाम बांटा हो गया। बाद में रेलवे लाइन आने से यह क्षेत्र बांता रघुनाथगढ़ और फिर बांता कहा जाने लगा। पाडिंया परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही मां की भक्ति पाडिंया परिवार की 38वीं पीढ़ी से जुड़े 95 वर्षीय नारायणलाल पाडिंया के अनुसार, परिवार की मौखिक परंपरा में चित्तौड़ के निकट पोटला में हुए अत्याचार और संघर्ष का प्रसंग सुनाया जाता रहा है।


