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खीमाराम मेवाडा
तखतगढ़ में आज भी जीवंत है जोधपुर रियासत कालीन होलिका दंडा रोपण की परंपरा
देर शाम ढोल थाली की झनकारो के बिच होली का खूंटा रोपण के साथ फाल्गुन का हुआ आगाज
तखतगढ 1फरवरी (खीमाराम मेवाडा) आगामी महीने मनाए जाने वाले होली के एक महीना पूर्व रविवार को माघ सुदी पूर्णिमा के अवसर पर राजस्व विभाग के हल्का पटवारी एव गांव चौधरी के हाथों 36 काॅम नगरवासीयो के सानिध्य पर रियासत कालीन परंपरा के अनुसार ढोल थाली की झनकारो के बिच होली का खूंटा रोपण कर धुमधाम से फाल्गुन का आगाज हुआ। रविवार को कस्बे के पटवार भवन मैं पटवारी रमेश चौधरी, गांव चौधरी हीराराम चौधरी, प्रतिहारी नाथूराम मेघवाल, नगर पालिका उपाध्यक्ष मनोज नामा, व्यापार संघ अध्यक्ष मनरूप सुथार सहित 36 काॅम के नगर वासीयो ने एकत्रित होकर थाली में पूजा सामग्री लेकर टोल थाली की गुंजायमान के साथ होली चौक पहुंचकर श्री चांदरा माता मंदिर में पूजा अर्चना के बाद पंडित निर्मल शास्त्री द्वारा रियासत कालीन के अनुसार चली आ रही परंपरागत रूप से पटवारी रमेश चौधरी एवं गांव चौधरी हीराराम चौधरी के हाथों होली के खूटै पर लाल वस्त्र और मौली कुमकुम लगाकर विधिवत खूटै की पूजा करवाई तत्पश्चात होली चौक पर देर शाम 7 बजे ढोल थाली की झनकारो के बिच होली का खूंटा रोपण करवाकर नारियल की जोत के साथ चांदरा माता की जयकारो के साथ धूमधाम से फाल्गुन का आगाज किया गया। इस अवसर पर पुखराज घांची,वीराराम चौधरी, रामसिंह कांबावत,प्रभुराम घांची, व्यापार संघ अध्यक्ष मनरूपमल सुथार, कन्हैया लाल चौधरी, कृषि विभाग के अधिकारी मंगलाराम मीणा, मोहनलाल चौधरी सहित 36 काॅम नगर वासी मौजूद रहे।
आज भी जीवंत है जोधपुर रियासत कालीन होलिका दंडा रोपण की परंपरा
यह है की तखतगढ़ कस्बे में जोधपुर रियासत काल से चली आ रही होलिका दंडा रोपण की परंपरा आज भी पूरी आस्था, विधि-विधान और सामाजिक सहभागिता के साथ निभाई जा रही है। यह परंपरा रियासत कालीन प्रशासनिक एवं सामाजिक व्यवस्था की सजीव स्मृति मानी जाती है। जो पीढ़ी दर पीढ़ी अक्षुण्ण बनी हुई है।
परंपरानुसार होलिका दंडा रोपण का आयोजन पटवार भवन (हवाला भवन) से प्रारंभ होता है, जहां से हल्काधीश (पटवारी) के नेतृत्व में गांव के चौधरी, प्रतिकार तथा रियासत काल से सेवाएं देते आ रहे मेघवाल समाज के वारिसान एवं ग्रामीणजन एकत्रित होकर होली चौक गोगरा मार्ग पहुंचते हैं। यहां विधिवत पूजा-अर्चना कर होलिका के दंडे का रोपण किया जाता है।
स्थापित किया गया दंडा लगभग एक माह तक खड़ा रहता है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के शुभ अवसर पर ग्रामीणों की सामूहिक उपस्थिति में इसका दहन किया जाता है। इसके पश्चात रंगों के पर्व होली को आपसी भाईचारे, हंसी-मजाक और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
कस्बे के बुजुर्गों के अनुसार यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि तखतगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता की मिसाल भी है, जिसे सदियों से पूरी निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है।
