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जोधपुर-जोधपुर सेंट्रल जेल में एक विचाराधीन बंदी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत और उसके शरीर पर मिले चोटों के गंभीर निशानों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस फरजंद अली की कोर्ट ने 8 जनवरी को एक मामले की सुनवाई करते हुए जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कोर्ट ने जेल अधीक्षक और जेलर को एफिडेविट देकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि जेल में रहते हुए बंदी को इतनी गंभीर चोटें कैसे आई। साथ ही, न्यायिक जांच में हो रही देरी पर नाराजगी जताते हुए जांच अधिकारी को 15 दिन के अंदर रिपोर्ट पेश करने का अल्टीमेटम दिया है।
हैरानी की बात है कि कोर्ट की फटकार के अगले ही दिन शुक्रवार दोपहर बाद पाली जेल में एक और बंदी की संदिग्ध परिस्थितियों में सुसाइड की घटना सामने आई है। ऐसे में अब इन दोनों ही मामलों पर हाईकोर्ट की नजर रहेगी।
2 जुलाई 2025 को रूपाराम सीरवी की कस्टोडियल डेथ
पाली जिले के गुड़ा एंदला गांव निवासी रूपाराम सीरवी (35) की 2 जुलाई 2025 को जोधपुर सेंट्रल जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। तीन छोटे बच्चों के पिता रूपाराम पॉक्सो मामले में ढाई साल से विचाराधीन बंदी के रूप में जेल में था। उस दिन तबीयत खराब होने पर उसे जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल ले जाया गया, जहांडॉक्टर ने उसे मृत बताया। जेल प्रशासन ने “साइलेंट हार्ट अटैक” का दावा किया, लेकिन शव की जांच में सिर, कान और गर्दन के पास गंभीर चोट के निशान पाए।
याचिकाकर्ता के वकील वासुदेव चारण ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में गर्दन के पास 15 सेमी लंबी गंभीर चोट, अंदरूनी ब्लीडिंग की पुष्टि हुई, जो जेल प्रशासन के दावे के विपरीत था। हालांकि, जेल के सीसीटीवी फुटेज और डिस्पेंसरी रिकॉर्ड में कोई घाव नजर नहीं आया, जिससे यह सवाल उठा कि घाव कैसे और कहां लगा।
गत 8 जुलाई 2025 को जेल आईजी विक्रम सिंह ने तीन जेल अधिकारियों – उप कारापाल तुलसीराम प्रजापत, मुख्य प्रहरी हीरसिंह और प्रहरी राजू राम को निलंबित कर दिया था। परिजनों ने FIR, CBI जांच और मुआवजे की मांग करते हुए धरना दिया। बाद में रूपाराम की पत्नी लीला की ओर से एडवोकेट वासुदेव चारण ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट पिटिशन दाखिल कर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
कोर्ट ने अपने आदेश में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए घटना की भयावहता को रेखांकित किया। रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक के शरीर पर मांसपेशियों में जमा खून, धारदार हथियार से बने घाव और सिर के हिस्से में सूजन पाई गई है। इतना ही नहीं, शरीर पर ताजा खून बहने के निशान और रगड़ भी मिलीहै।
अटॉप्सी करने वाले डॉक्टर ने अपनी राय में स्पष्ट किया है कि ये सभी चोटें ‘एंटे-मॉर्टम’ यानी मृत्यु से पूर्व की हैं और ये मौत से 0 से 6 घंटे पहले ही पहुंचाई गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की है कि जब चोटें लगने के समय मृतक जेल अधीक्षक की कस्टडी में था, तो वे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
जेल में वसूली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के सामने चौंकाने वाले तथ्य रखे। वकील ने तर्क दिया कि मृतक के परिजनों से जेल में उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर अवैध वसूली की गई थी। सबूत के तौर पर वकील ने कुछ स्क्रीनशॉट भी पेश किए, जो जेल अधिकारियों के साथ हुए संचार और पैसों के लेन-देन को दर्शाते हैं।
इस पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह न्यायिक संज्ञान का विषय है कि जेलों में भ्रष्टाचार और अवैध वसूली असामान्य नहीं है। ऐसी व्यवस्थागत खामियों के कारण ही जेल के अंदर मोबाइल, ड्रग्स और कभी-कभी हथियार तक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।”।
अधिकारियों की ‘जिम्मेदारी’ तय
कोर्ट ने कानूनी सिद्धांत ‘कस्टोडियल रिस्पांसिबिलिटी’ का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जेल की चारदीवारी के भीतरहोने वाली किसी भी अप्रिय घटना के लिए जेल प्रशासन पर ‘प्रतिनिधि दायित्व’ (vicarious liability) लागू होता है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह पता लगाना जरूरी है कि मृतक किस बैरक में था, उसके साथ कौन से अन्य बंदी थे और उस समय वहां किस प्रहरी की ड्यूटी थी। कोर्ट ने जेल अधीक्षक, जेलर और संबंधित पुलिस अधीक्षक को अलग-अलग एफिडेविट दाखिल कर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
जांच में देरी पर नाराजगी, 15 दिन की डेडलाइन
मामले की न्यायिक जांच जुलाई 2025 से लंबित है, जिसे लेकर कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई। एसीजेएम (सीबीआई केस), जोधपुर मेट्रो द्वारा भेजी गई रिपोर्ट को देखने के बाद कोर्ट ने कहा कि जांच में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी (ACJM) अपने अन्य रूटीन कार्यों को छोड़कर प्राथमिकता के आधार पर इस जांच को पूरा करें और आदेश की प्रति मिलने के 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भी निर्देश दिया है कि वे जांच अधिकारी को कस्टोडियल डेथ की जांच के संवैधानिक महत्व के प्रति संवेदनशील बनाएं। मामले की अगली सुनवाई 23 जनवरी 2026 को होगी।

