PALI SIROHI ONLINE
महावीर मेवाडा/खीमाराम मेवाडा
सुमेरपूर। सिन्दरु में उमड़ा आस्था का महासैलाब: 68 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद संपन्न हुआ ऐतिहासिक ‘समुद्र मंथन समद डोवण उत्सव’
सांडेराव। मारवाड़ की सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का निर्वहन करते हुए सिन्दरु क्षेत्र में ऐतिहासिक ‘समुद्र मंथन समद डोवण उत्सव’ हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ सकुशल संपन्न हुआ। भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक माने जाने वाले इस पावन उत्सव का गवाह बनने के लिए समूचे क्षेत्र से 10,000 से अधिक श्रद्धालुओं का महासैलाब उमड़ पड़ा, जिसने सिन्दरु को आस्था के एक विशाल केंद्र में बदल दिया।


68 वर्षों बाद दिखा ऐसा ऐतिहासिक दृश्य

क्षेत्रीय ग्रामीणों और प्रवासियों के अनुसार, सिन्दरु के इतिहास में पूरे 68 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस भव्य आयोजन को दोबारा जीवित किया गया है।


उत्सव की शुरुआत ढोल-नगाड़ों की थाप और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कलश व भव्य शोभायात्रा के साथ हुई। पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में सजी महिलाओं ने मंगलगीत गाते हुए मुख्य तालाब की ओर प्रस्थान किया। मुख्य जलाशय पर पहुंचकर विधि-विधान से तालाब पूजन की रस्म पूरी की गई, जिसके बाद मन्नतधारी महिलाओं और श्रद्धालुओं ने पवित्र जल में उतरकर पारंपरिक समुद्र मंथन की ऐतिहासिक रस्म को संपन्न किया।


सिन्दरु वाघनाडी में उमड़े हजारों भक्त, मार्ग हुए जाम-
मुख्य आयोजन के साथ-साथ सिन्दरु वाघनाडी में भी सुबह से ही हजारों श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति देखी गई। समूचा क्षेत्र ‘जयकारों’ से गूंज उठा और माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।

श्रद्धालुओं की इतनी भारी तादाद के कारण सिन्दरु की ओर आने वाले प्रमुख मार्गों पर जबरदस्त यातायात दबाव (ट्रैफिक जाम) की स्थिति बन गई। हालांकि, स्थानीय प्रशासन और वॉलिंटियर्स की मुस्तैदी से स्थिति को नियंत्रित रखा गया। इस पूरे विशाल और ऐतिहासिक आयोजन की कमान समाज सेवी हनुवंत सिंह राणावत, पंचायत प्रशासक चौथी देवी समाजसेवी नरेंद्र देवासी के हाथों में थी। उनके कुशल एवं अनुशासित नेतृत्व में इतना बड़ा धार्मिक समागम पूरी तरह शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और सकुशल संपन्न हुआ। स्थानीय समाजसेवी और प्रवासियों के विशेष सहयोग से तालाब परिसर में सुरक्षा और सफाई के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे। सिंदरू गांव के राजेंद्र सिंह राणावत का कहना है कि 68 वर्षों बाद दिखा यह अलौकिक और ऐतिहासिक दृश्य सिन्दरु के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।



