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खीमाराम मेवाडा
लखनऊ हादसे के बाद तखतगढ़ में भी उठे बड़े सवाल: क्या यहां भी नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
तखतगढ 26 जून (खीमाराम मेवाडा) लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) क्षेत्र में एक कमर्शियल बिल्डिंग के बेसमेंट में लगी भीषण आग में 15 लोगों की दर्दनाक मौत ने देशभर में भवन सुरक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार हादसे की वजह शॉर्ट सर्किट या एयर कंडीशनिंग (AC) प्रणाली में तकनीकी खराबी मानी जा रही है, जबकि बेसमेंट में रखे प्लास्टिक उत्पादों ने आग को तेजी से पूरी इमारत में फैलाने का काम किया।
ऐसी घटनाएं देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर सामने आती रहती हैं। हर हादसे के बाद प्रशासन हरकत में आता है, बड़े स्तर पर निरीक्षण अभियान शुरू होते हैं, सुरक्षा मानकों की समीक्षा होती है, भवनों के उपयोगिता प्रमाण-पत्रों की जांच की जाती है, नोटिस जारी होते हैं और कुछ दिनों तक व्यवस्था सक्रिय दिखाई देती है। लेकिन अक्सर कुछ समय बाद सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाता है। यही कारण है कि लोगों के बीच अब यह धारणा बनने लगी है— “चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात।”
तखतगढ़ कस्बे के संदर्भ में भी अब कई सवाल उठने लगे हैं। कस्बे में पिछले वर्षों में तेजी से व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी हैं और इसके साथ बड़ी संख्या में कॉम्प्लेक्स, बहुमंजिला भवन और आयोजन स्थल विकसित हुए हैं। स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि कई भवनों को स्वीकृति तो आवासीय श्रेणी में प्राप्त हुई, लेकिन वर्तमान में उनका उपयोग वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।
यदि किसी भवन की अनुज्ञा आवासीय उपयोग के लिए ली गई हो और उसका संचालन व्यावसायिक रूप से किया जा रहा हो, तो यह केवल भवन नियमों का विषय नहीं बल्कि सुरक्षा और राजस्व दोनों का प्रश्न बन जाता है। वाणिज्यिक उपयोग वाले भवनों में लोगों की आवाजाही अधिक होती है, अग्नि सुरक्षा, पार्किंग, आपात निकास और संरचनात्मक मानकों की जरूरत भी अलग होती है। साथ ही नगरपालिका को मिलने वाले कर और शुल्क भी अलग श्रेणी में आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संबंधित निकाय समय-समय पर वास्तविक उपयोग की जांच करता है या केवल रिकॉर्ड तक सीमित है?
कस्बे में जगह-जगह विकसित हो रहे मैरिज हाल और आयोजन स्थलों को लेकर भी समय-समय पर सवाल सामने आते रहे हैं। शादी समारोहों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति, वाहनों का दबाव, बिजली की अस्थायी व्यवस्थाएं और अग्निशमन संसाधनों की उपलब्धता महत्वपूर्ण विषय हैं। वहीं कार्यक्रम समाप्त होने के बाद खुले में छोड़ा जाने वाला भोजन अपशिष्ट और अन्य कचरा कई स्थानों पर स्वच्छता व्यवस्था को प्रभावित करता है। इससे दुर्गंध, गंदगी और पशुओं की आवाजाही जैसी समस्याएं भी बढ़ती हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नियमों का उद्देश्य केवल अनुमति जारी करना नहीं बल्कि उनका पालन सुनिश्चित करना भी होना चाहिए। यदि किसी भवन का उपयोग बदला गया है तो उसकी सुरक्षा समीक्षा, श्रेणी निर्धारण और आवश्यक अनुमतियों की पारदर्शी जांच होनी चाहिए। इसी प्रकार आयोजन स्थलों के लिए भी स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन की जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
अब सवाल यह नहीं है कि अगला निरीक्षण कब होगा, बल्कि सवाल यह है कि क्या निरीक्षण वास्तविक होंगे या फिर कुछ दिनों की औपचारिक कार्रवाई के बाद फाइलें बंद कर दी जाएंगी। क्योंकि हादसे पहले चेतावनी नहीं देते और जब व्यवस्था कागजों पर चलती है तो नुकसान जमीन पर दिखाई देता है।
तखतगढ़ में भी समय रहते भवन उपयोग, अग्नि सुरक्षा, नगरपालिका राजस्व और स्वच्छता मानकों की गंभीर समीक्षा नहीं हुई तो भविष्य में किसी घटना के बाद केवल जांच और जिम्मेदारी तय करने की घोषणाएं ही शेष रह जाएंगी।

