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मारवाड़ी संयुक्त परिवार : टूटते रिश्तों की चिंताजनक विडंबना
दलपतसिंह भायल
मारवाड़ी समाज अपनी एकता, पारिवारिक मजबूती और संयुक्त परिवार व्यवस्था के लिए जाना जाता
रहा है। लेकिन बदलते समय और आधुनिक सोच की आड़ में आज वही पहचान धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है। यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ यूँ ही जारी रहीं, तो आने वाले 20 वर्षों में मारवाड़ी घरों से भाई-भाभी, देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी, काका-काकी जैसे अनेक रिश्ते हमेशा के लिए लुप्त हो सकते हैं।
आज परिवार ढाई–तीन सदस्यों तक सिमटकर रह गया है। न बड़ा भाई जो संबल बने, न छोटा भाई जो जीवन की कठिनाइयों में साथ खड़ा हो। बहुएँ भी अकेली होती जा रही हैं—न देवरानी, न जेठानी। बच्चों का बचपन भी बिना चचेरे-ममेरे भाई-बहनों के सूना हो गया है। यह स्थिति तथाकथित एक बच्चा संस्कृति और बढ़ते अहंकार का परिणाम है।
एक समय था जब कच्चे घरों में भी बड़े-बड़े परिवार खुशी-खुशी रह लेते थे, आज बड़े बंगलों में भी सन्नाटा पसरा है। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसे आदर्श पारिवारिक उदाहरण अब केवल ग्रंथों तक सीमित होते जा रहे हैं। दो भाइयों वाले परिवार भी आज अंतिम दौर में दिखाई देते हैं।
यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि भविष्य की चुनौतियों से जूझने के लिए एक अकेला बच्चा स्वयं को कितना सक्षम बना पाएगा? जीवन के संघर्षों में भाई का कंधा, परिवार की सामूहिक शक्ति और बुजुर्गों का मार्गदर्शन—ये सब धीरे-धीरे इतिहास बनते जा रहे हैं। मारवाड़ी समाज की घटती जनसंख्या भी एक बड़ा चेतावनी संकेत है।
एक अन्य चिंताजनक पहलू है विवाह की बढ़ती उम्र। बच्चों को ‘पूरी तरह स्थापित’ करने के नाम पर विवाह 30-35 वर्ष तक टाल दिया जा रहा है, जिससे पीढ़ियों के बीच बड़ा अंतर पैदा हो रहा है। समाज को इस दिशा में पुनर्विचार करते हुए विवाह की उपयुक्त आयु 20 से 24 वर्ष के बीच निर्धारित करने की आवश्यकता है।
संस्कारों की कमी और व्यक्तिगत सुख को सर्वोपरि रखना भी परिवार टूटने का बड़ा कारण बन रहा है। सुख-दुःख में जब अपने साथ होते हैं, तब जीवन का वास्तविक आनंद मिलता है। संयुक्त परिवार केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
साथ ही, नई पीढ़ी को सभी भाषाओं का ज्ञान दिया जाए, लेकिन घर के भीतर मारवाड़ी भाषा का प्रयोग अवश्य हो, ताकि हमारी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत बनी रहें।
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। अहंकार छोड़कर सामूहिकता की ओर लौटने की। क्योंकि जैसा हम आज बोएँगे, वैसा ही भविष्य हमें लौटकर मिलेगा। यह विषय केवल चिंता नहीं, बल्कि समय रहते चेतने की चेतावनी है।

