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रेप और हत्या के दोषी को फांसी की जगह उम्रकैदःहाईकोर्ट ने कहा- पहली बार का अपराधी, ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ केस नहीं

Pintu Aggarwal by Pintu Aggarwal
April 18, 2026
in Local
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PALI SIROHI ONLINE

जोधपुर-राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने डूंगरपुर में 10 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में आरोपी की फांसी की सजा को ‘शेष प्राकृतिक जीवन के लिए आजीवन कारावास’ में बदल दिया है। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने रेप व मर्डर के दोषी जितेंद्र उर्फ जीतू को विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा के आदेश में ये संशोधन किया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अपराध जघन्य जरूर है, लेकिन यह दुर्लभ से दुर्लभतम (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) की श्रेणी में नहीं आता- क्योंकि आरोपी पहली बार का अपराधी है, उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह पत्नी और दो नाबालिग बच्चों का मुखिया है।

आधी रात सोती बच्ची को उठा ले गया

यह घटना डूंगरपुर जिले के सदर थाना क्षेत्र की है। 28-29 जून 2022 की आधी रात को पीड़ित मासूम बच्ची ‘A’ (गोपनीयता हेतु बदला हुआ नाम) अपने घर के आंगन में अपनी मां ‘R’ और भाई-बहनों के साथ सो रही थी। सुबह करीब 5:30 बजे जब उसकी मां की आंख खुली, तो उन्होंने पाया कि बच्ची बिस्तर से गायब थी।

परिजनों ने आसपास के खेतों और रास्तों पर उसकी तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं लगा। इसी दिन शाम को ‘दिपट फल्ला’ मार्ग पर एक पुलिया के भीतर बच्ची का लहूलुहान शव बरामद हुआ। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया और 2 जुलाई 2022 को पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू को गिरफ्तार कर लिया।

इस मामले में डॉ. गुणवंती मीणा द्वारा किए गए पोस्टमॉर्टम में यह पुष्टि हुई कि बच्ची के साथ वीभत्स यौन हमला किया गया था और उसके सिर पर भारी पत्थर से प्रहार करने के साथ ही गला घोंटकर उसकी हत्या की गई थी।

चैन ऑफ एविडेंस और आरोपी की गिरफ्तारी

गवाह मोगा कटारा ने बयान दिया कि 29 जून को सुबह 6:30 बजे उसने आरोपी जितेंद्र उर्फ जीतू को उसी पुलिया के पास बीयर की बोतल लिए देखा था। पूछने पर आरोपी ने कहा कि उसे रात भर से चिंता है। एक अन्य गवाह ने 28 जून की शाम आरोपी के साथ पीने की बात कबूली और उस दौरान ली गई फोटो में आरोपी की बेज रंग की शर्ट पहचानी।

इसी आधार पर 2 जुलाई 2022 को आरोपी को गिरफ्तार किया गया। 3 जुलाई को उसके घर से वही शर्ट और अंडरगार्मेंट बरामद हुए। फॉरेंसिक रिपोर्ट (FSL) में पुष्टि हुई कि शर्ट पर पीड़ित बच्ची का खून और पीड़ित के कपड़ों पर आरोपी के बाल मिले, यह साक्ष्यों की कड़ी (chain of evidence) निर्णायक रही।

बचाव पक्षः रिकवरी और साक्ष्यों पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मर्डर रेफरेंस और दोषी की अपील पर लंबी कानूनी जिरह हुई। आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विनीत जैन ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है।

उन्होंने दलील दी कि पुलिस ने आरोपी के घर से जो कपड़े बरामद किए, उस समय घर पर कोई ताला नहीं लगा था और न ही कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था, जो इस रिकवरी को संदिग्ध बनाता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आरोपी वारदात के बाद न तो फरार हुआ और न ही उसने छिपने की कोशिश की, जो उसकी निर्दोषता का एक बड़ा संकेत है।

बच्ची से दरिंदगी अंतरात्मा को झकझोरने वाली

इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि एक 10 साल की असहाय बच्ची के साथ की गई यह दरिंदगी समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाली है, इसलिए मृत्युदंड ही एकमात्र न्यायोचित सजा है।

हाईकोर्ट का विश्लेषणः क्यों टली फांसी की सजा?

खंडपीठ ने साक्ष्यों का गहनता से पुनर्मूल्यांकन करते हुए माना कि अभियोजन पक्ष ने दोषसिद्धि की कड़ियों को वैज्ञानिक रूप से साबित किया है। एफएसएल रिपोर्ट में मृतक की टी-शर्ट पर आरोपी के सिर के बाल मिले और आरोपी की शर्ट पर मृतक के खून की पुष्टि हुई।

इसके अलावा, गवाह मोगा कटारा ने घटना वाली सुबह आरोपी को उसी पुलिया से बाहर निकलते देखा था, जहां बाद में शव मिला। इन साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने दोषी की सजा को बरकरार रखा, लेकिन मृत्युदंड के प्रश्न पर उदार रुख अपनाया।

सजा को उम्रकैद में परिवर्तित करते हुए अदालत ने संदर्भमामले के सिद्धांतों का हवाला दिया। कोर्ट ने पाया कि दोषी जितेंद्र का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वह विवाहित है और उसके दो छोटे बच्चे हैं। कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि चूंकि अपराध पूर्व-नियोजित नहीं था और अपराधी की सामान्य सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि व जेल में उसके आचरण को देखते हुए उसमें सुधार की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इन्हीं मानवीय और कानूनी पहलुओं को आधार बनाकर हाईकोर्ट ने फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

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