तखतगढ-टोल कम्पनी की एम्बुलेंस गायब, सैकड़ों किलोमीटर हाइवे और दर्जनों गांव केवल 108 के भरोसे ही क्यो ,जबकी करोड़ों की टोल वसूली के बावजूद आपातकालीन सेवाएं बदहाल, आखिर जिम्मेदार कौन
PALI SIROHI ONLINE
खीमाराम मेवाडा
टोल कम्पनी की एम्बुलेंस गायब, सैकड़ों किलोमीटर हाइवे और दर्जनों गांव केवल 108 के भरोसे ही क्यो ,जबकी करोड़ों की टोल वसूली के बावजूद आपातकालीन सेवाएं बदहाल, आखिर जिम्मेदार कौन
तखतगढ 18 मई (खीमाराम मेवाडा) सांडेराव से पचपदरा नेशनल हाइवे 325 पर सफर करने वाली जनता से बलाना गुड़िया टोल प्लाजा पर प्रतिदिन लाखों रुपये टोल टैक्स वसूला जा रहा है। लेकिन हादसे के वक्त यही जनता अपनी जिंदगी बचाने के लिए केवल 108 एम्बुलेंस के भरोसे छोड़ दी जाती है। सैकड़ों किलोमीटर लंबे हाइवे और उससे जुड़े दर्जनों गांवों, ढाणियों व संपर्क मार्गों पर टोल कम्पनी की आपातकालीन सेवाएं लगभग नदारद दिखाई देती हैं। जहा आए दिन कही न कही हादसा होते ही सबसे पहले स्थानीय ग्रामीण हो या राहगीर और निजी वाहन मदद के लिए पहुंचते हैं।
जबकि टोल कम्पनी की एम्बुलेंस और पेट्रोलिंग टीम का कहीं अता-पता नहीं रहता। कई मामलों में घायल लोग लंबे समय तक सड़क किनारे तड़पते रहते हैं। और “गोल्डन ऑवर” निकल जाने के कारण उनकी हालत गंभीर हो जाती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है। कि जब टोल कम्पनी जनता से सुरक्षा और सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपये वसूल रही है। तो आखिर उसकी अनिवार्य आपातकालीन सेवाएं जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देती? और ना ही टोल की एंबुलेंस के कहीं भी नंबर सार्वजनिक नहीं किए गए।
तो क्या टोल केवल वसूली का कारोबार बन चुका है? जबकी NHAI और हाइवे संचालन नियमों के अनुसार टोल कम्पनी पर 24 घंटे एम्बुलेंस सेवा, नियमित पेट्रोलिंग, दुर्घटना राहत, क्रेन सुविधा, प्राथमिक उपचार और त्वरित आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था उपलब्ध करवाना अनिवार्य होता है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है। कि इस हाइवे पर रोजाना सैकड़ों किलोमीटर लंबे मार्ग पर आमजन केवल सरकारी 108 एम्बुलेंस के भरोसे जीवन और मौत की लड़ाई लड़ रहा है।
जो कि यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि आमजन के संवैधानिक “जीवन के अधिकार” के साथ खुला खिलवाड़ है। जनता जब टोल टैक्स देती है। तो वह केवल सड़क पर चलने का शुल्क नहीं देती, बल्कि सुरक्षित यात्रा और आपातकालीन सहायता का अधिकार भी खरीदती है। यदि हादसे के समय सहायता उपलब्ध नहीं है, तो फिर टोल वसूली करना किस नैतिक और कानूनी आधार पर जारी रखते है। सबसे चिंताजनक बात यह है। कि जिला प्रशासन और हाइवे अथॉरिटी इस गंभीर लापरवाही पर मौन साधे बैठे हैं। आखिर जिम्मेदार अधिकारी इन सेवाओं की निगरानी क्यों नहीं कर रहे? क्या किसी बड़े हादसे और जनआक्रोश के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी?
क्षेत्रवासियों ने उठाई मांग —
क्षेत्र वासियों का कहना है कि हाइवे पर टोल कम्पनी की वास्तविक एम्बुलेंस और पेट्रोलिंग व्यवस्था का सार्वजनिक ऑडिट हो।
दुर्घटना प्रतिक्रिया समय (Response Time) की जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
लापरवाह टोल कम्पनी और संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
जहां आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं वहां टोल वसूली पर पुनर्विचार किया जाए।
क्षेत्र वासियों का यह भी कहना है कि यदि जनता हर सफर पर समय पर टोल चुकाती है। तो टोल कम्पनी और प्रशासन भी समय पर जिंदगी बचाने की जिम्मेदारी निभाए। वरना यह व्यवस्था सेवा नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी की कीमत पर चल रही खुली लापरवाही मानी जाएगी।
