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खीमाराम मेवाडा
तखतगढ़ में बैंकों की CSR उदासीनता: मुनाफा यहाँ से, जिम्मेदारी कहाँ?
तखतगढ 26 फरवरी (खीमाराम मेवाड) तखतगढ़ जैसे उभरते व्यावसायिक कस्बे में सरकारी एवं निजी क्षेत्र के बैंक वर्षों से स्थानीय व्यापार, कृषि और आमजन की जमा पूंजी के सहारे निरंतर लाभ अर्जित कर रहे हैं। लेकिन जब बात कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) निभाने की आती है, तो यही बैंक चुप्पी साध लेते हैं। यह स्थिति न केवल कम्पनी अधिनियम, 2013 की भावना के विपरीत है, बल्कि समाज के प्रति वित्तीय संस्थानों की नैतिक जिम्मेदारी पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
कानून का स्पष्ट प्रावधान, फिर भी उदासीनता
कम्पनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के तहत निर्धारित पात्रता वाली कंपनियों के लिए अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत CSR गतिविधियों पर व्यय करना अनिवार्य है। बैंकों सहित बड़े कॉर्पोरेट संस्थान इस प्रावधान के दायरे में आते हैं। इसके बावजूद तखतगढ़ में संचालित बैंक शाखाओं द्वारा स्थानीय स्तर पर CSR के उल्लेखनीय कार्य दिखाई नहीं देते।
स्थानीय आवश्यकताएँ और बैंकों की चुप्पी
तखतगढ़ और आसपास के क्षेत्र में अनेक बुनियादी जरूरतें आज भी अधूरी हैं —सरकारी विद्यालयों में फर्नीचर व डिजिटल संसाधनों का अभाव, स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक उपकरणों की कमी,पेयजल एवं जल संरक्षण की अपर्याप्त व्यवस्था,दिव्यांगजनों व जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए सहायता योजनाओं का अभाव
ये वे क्षेत्र हैं जहां CSR फंड के माध्यम से ठोस और स्थायी बदलाव लाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश, बैंकों की प्राथमिकताओं में स्थानीय समाज का विकास शामिल नहीं दिखता।
नैतिक जिम्मेदारी से विमुखता
CSR केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि समाज के प्रति संस्थानों की जवाबदेही का प्रतीक है। तखतगढ़ की जनता का धन, श्रम और विश्वास ही बैंकों के मुनाफे का आधार है। ऐसे में सामाजिक विकास से दूरी बनाना नैतिक रूप से भी अनुचित है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत
अब समय आ गया है कि: बैंक अपनी CSR रिपोर्ट सार्वजनिक करें
स्थानीय स्तर पर CSR योजनाएँ लागू करें
प्रशासन और जनप्रतिनिधि निगरानी सुनिश्चित करें
सामाजिक संगठनों को योजना निर्माण में शामिल किया जाए
यदि वित्तीय संस्थान केवल लाभ कमाने तक सीमित रहेंगे और समाज के विकास में भागीदारी नहीं निभाएंगे, तो CSR की अवधारणा खोखली साबित होगी। तखतगढ़ की जनता का यह प्रश्न वाजिब है —
“जब मुनाफा हमारे क्षेत्र से कमाया जा रहा है, तो विकास का अधिकार हमें क्यों नहीं?”
