PALI SIROHI ONLINE
सिरोही-गणेश चतुर्थी के मौके पर हम आपको सिरोही जिले के राड़बर गांव में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित एक ऐसे प्राचीन गजानंद मंदिर से रूबरू करा रहे हैं, जिसकी खासियत बेहद अनोखी है। यहां भगवान गणपति की दो प्रतिमाएं एक साथ स्थापित हैं और दोनों की सूंड अलग-अलग दिशा में है। एक प्रतिमा की सूंड दाईं ओर है, जबकि दूसरी की बाईं ओर।
पुजारी रामसिंह राजपुरोहित के अनुसार दोनों प्रतिमाओं कोरिद्धि और सिद्धि का स्वरूप माना जाता है। इनमें से एक प्रतिमा श्याम वर्ण की है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर करीब 2000 वर्षों से आस्था का केंद्र है और गणेश चतुर्थी पर यहां 45 से 50 हजार श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
दो प्रतिमाएं, दोनों की अलग दिशा में सूंड
मंदिर में विराजमान दोनों गणपति प्रतिमाओं की अपनी अलग विशेषता है। एक प्रतिमा की सूंड दाईं ओर और दूसरी की बाईं ओर है। स्थानीय लोगों के अनुसार ऐसी विशेषता बहुत कम मंदिरों में देखने को मिलती है। यही कारण है कि यह मंदिर क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।
पुजारी रामसिंह राजपुरोहित के अनुसार दोनों प्रतिमाओं को रिद्धि और सिद्धि के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। इनमें से एक प्रतिमा श्याम रंग की है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में विशेष धार्मिक आस्था है।
पांडवकाल से जुड़ी मान्यता, कभी राजगढ़ के नाम से जाना जाता था गांव
स्थानीय राजपुरोहित-जोशी परिवार और जनश्रुति के अनुसार मंदिर का इतिहास पांडवकालीन समय से जुड़ा माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार उस समय इस गांव का नाम राजगढ़ हुआ करता था और उसी दौर में मंदिर में दोनोंगणपति प्रतिमाओं की स्थापना की गई थी।
मंदिर की देखरेख और पूजा-पाठ की जिम्मेदारी राजपुरोहित (जोशी) परिवार द्वारा स्थापना काल से निभाए जाने की बात स्थानीय लोग बताते हैं। बताया जाता है कि प्राचीन समय में यहां बड़ी संख्या में राजपुरोहित समाज के परिवार निवास करते थे।
एक दिन में 120 बारातें आने की भी जनश्रुति
स्थानीय लोगों के अनुसार प्राचीन राजगढ़ इतना बड़ा और समृद्ध नगर था कि यहां एक दिन में एक साथ 120 बारातें आई थीं और इसी गांव में उनके विवाह हुए थे। बताया जाता है कि उस समय यहां करीब 32 अलग-अलग गोत्रों के राजपुरोहित परिवार निवास करते थे।
इसी आधार पर स्थानीय लोग प्राचीन राजगढ़ की विशालता का अंदाजा लगाते हैं। वर्तमान में राड़बर और इसके आसपास रहने वाले कई परिवारों का संबंध भी इसी गांव से रहा है।
31 साल पहले श्याम वर्ण की प्रतिमा ने दूध पिया था
करीब 31 वर्ष पहले देशभर में भगवान गणपति द्वारा दूध पीने की घटना चर्चा में आई थी। उस समय राड़बर और आसपास के लोग भी दूध की बाल्टियां लेकर मंदिर पहुंचे थे।
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में स्थापित श्याम वर्ण की गणपति प्रतिमा को भी श्रद्धालुओं ने अपने हाथों से दूधपिलाया था। श्रद्धालुओं का मानना था कि प्रतिमा ने दूध ग्रहण किया। भक्त इसे गजानंदजी का चमत्कार और आशीर्वाद मानते हैं। यह घटना आज भी मंदिर से जुड़ी चर्चित धार्मिक मान्यताओं में शामिल है।
गणेश चतुर्थी पर 45-50 हजार श्रद्धालुओं की भीड़
सामान्य दिनों में भी मंदिर में श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन गणेश चतुर्थी पर यहां का नजारा अलग होता है। हर वर्ष करीब 45 से 50 हजार श्रद्धालु भगवान गजानंदजी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा सहित देश के अलग-अलग राज्यों से श्रद्धालु यहां आते हैं। भक्त भगवान से मन्नत मांगते हैं और मनोकामना पूरी होने के बाद चूरमे और मोदक का भोग लगाते हैं।
2500 लीटर दूध से बनती है खीर प्रसादी
गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहां लगने वाले मेले में खीर प्रसादी की परंपरा भी कई वर्षों से चली आ रही है। ग्रामवासी और भक्त मिलकर पूरे गांव से दूध एकत्र करते हैं। इससे करीब 2500 लीटर दूध की खीर तैयार की जाती है।
स्थानीय गणपति युवा मंडल के सदस्य इसकी व्यवस्था संभालते हैं। मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को खीर प्रसादी वितरित की जाती है। ग्रामवासियों और भक्तों केसहयोग से यह परंपरा आज भी जारी है।
घने जंगल के बीच मंदिर, धव के पेड़ों को नहीं पहुंचाते नुकसान
गजानंदजी का मंदिर घने जंगल के बीच स्थित है। मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में धव के पेड़ हैं, जिन्हें स्थानीय लोग काफी कीमती मानते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इन पेड़ों की कीमत लाखों रुपये तक बताई जाती है।
ग्रामीणों में गजानंदजी की कृपा और आशीर्वाद को लेकर ऐसी आस्था है कि मंदिर के आसपास के जंगल और पेड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता। धार्मिक आस्था के साथ यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से भी अपनी अलग पहचान रखता है।
गजानंदजी के साथ दूधेश्वर महादेव और संतोषी माता का मंदिर
मंदिर परिसर में गजानंदजी के मंदिर के अलावा दूधेश्वर महादेव का मंदिर भी है, जहां भगवान शिव के साथ माता पार्वती विराजमान हैं। इसके अलावा गजानंदजी की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता का मंदिर भी परिसर में स्थित है।
गांव में एक और परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। स्थानीय मान्यता के अनुसार परिवार में प्रथम संतान के पुत्र होने पर गांव की बेटियां और बेटे भगवान गजानंदजी के दर्शन करने आते हैं। यहां बच्चों की चोटी या मुंडन करवाने कीपरंपरा भी बताई जाती है।
प्राचीन बावड़ी का पानी कभी खत्म नहीं होने की मान्यता
मंदिर परिसर में एक प्राचीन बावड़ी भी मौजूद है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इसका पानी कभी समाप्त नहीं होता। हजारों श्रद्धालु इस पानी का उपयोग स्नान और अन्य कार्यों के लिए करते हैं।
भक्त बावड़ी को भी गजानंदजी का आशीर्वाद और चमत्कार मानते हैं। मंदिर परिसर की धार्मिक मान्यताओं के साथ यह प्राचीन बावड़ी भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का हिस्सा है।
आस्था, इतिहास और प्रकृति का अनोखा संगम
अरावली की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित राड़बर का यह प्राचीन गजानंद मंदिर अपनी दो अलग-अलग गणपति प्रतिमाओं, दोनों की अलग दिशा में सूंड, प्राचीन इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और वर्षों पुरानी परंपराओं के कारण खास पहचान रखता है।
गणेश चतुर्थी पर देश के अलग-अलग हिस्सों से उमड़ने वाली 45 से 50 हजार श्रद्धालुओं की भीड़ इस मंदिर के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है। वहीं सामूहिक रूप से 2500 लीटर दूध की खीर बनाकर प्रसादी बांटने की परंपरा इस धार्मिक आयोजन को और खास बना देती है।


