• March 15, 2026

युवाओं ने की तलवारबाजी, आग के गोलों से करतब दिखाए: दिन में उड़ा रंग-गुलाल, रात में दिवाली जैसी रोशनी; 459 साल से चल रही परंपरा

PALI SIROHI ONLINE

उदयपुर-मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और वीर परंपराओं के प्रतीक रुण्डेड़ा गांव में रविवार को रंग तेरस मनाई गई। इस अवसर पर गांव रंग और उल्लास से सराबोर हो उठा। जिले के वल्लभनगर उपखंड क्षेत्र के इस ऐतिहासिक गांव में पिछले 459 सालों से चली आ रही रंग तेरस की परंपरा इस साल भी पूरे उत्साह और भव्यता के साथ मनाई गई। इस अनूठे आयोजन को देखने के लिए आसपास के गांवों सहित दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों लोग रुण्डेड़ा पहुंचे।

पर्व के अवसर पर पूरे गांव को आकर्षक रोशनी और सजावट से सजाया गया था, जिससे रुण्डेड़ा किसी उत्सव नगरी जैसा नजर आ रहा था। सुबह से ही गांव की गलियों में ढोल-मादल की गूंज और उड़ते रंग-गुलाल के बीच उत्सव का माहौल बना रहा।

इस आयोजन में आसपास के गांव मेनार, ईंटाली, रोहिड़ा, नवानिया, गवारड़ी, खरसान, बाठरड़ा खुर्द, विजयपुरा, भटेवर, खेरोदा, बांसड़ा और बामनिया के साथ उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ तथा मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।विशेष बात यह रही कि विदेशों में रोजगार कर रहे गांव के युवा भी इस पर्व में शामिल होने के लिए विशेष रूप से अपने गांव पहुंचे। दुबई, मस्कट, अफ्रीका, अमेरिका और ब्रिटेन में कार्यरत युवाओं ने भी इस आयोजन में भाग लेकर अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति जुड़ाव दिखाया।

महात्मा जत्तीजी की धूणी से हुई शुरुआत

रंग तेरस महोत्सव की शुरुआत रविवार दोपहर करीब 12:30 बजे गांव की उत्तर दिशा में स्थित महात्मा जत्तीजी की धूणी से हुई। गांव के पंच ढोल, थाली और मादल के साथ धूणी पहुंचे और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर महात्मा जत्तीजी का स्मरण किया।

इसके बाद ग्रामीण ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ वहां से रवाना हुए और रास्ते में सीनियर सेकेंडरी स्कूल के पास स्थित डेमण्ड बावजी को भी आमंत्रित किया। वहां से आशीर्वाद लेने के बाद ग्रामीण रंग-गुलाल उड़ाते हुए और जयकारे लगाते हुए बड़े (ठाकुरजी) मंदिर पहुंचे।

मंदिर परिसर में पारंपरिक भांग लेने की रस्म के बाद ग्रामीणों ने जत्तीजी की अमानत माला, चिमटा और घोड़ी के साथ गैर नृत्य किया। इसके बाद जुलूस तलहटी मंदिर, निमड़िया बावजी, जुना मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर, महादेव मंदिर और जणवा समाज के मंदिर होते हुए पुनः बड़े मंदिर पहुंचा, जहां दोपहर का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

पारंपरिक मेहमाननवाजी

शाम के समय गांव में आए मेहमानों के स्वागत और सत्कार की विशेष व्यवस्था की गई। घर-घर में मक्के की पपड़ी, मीठी भुजिया, पकौड़े सहित पारंपरिक व्यंजन बनाकर मेहमानों को परोसे गए।

रात में गैर और घूमर से सजा माहौल

रात होते ही गांव में उत्सव का माहौल और भी रंगीन हो गया। पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ता और मेवाड़ी लाल पगड़ी पहनकर कार्यक्रम में पहुंचे, जबकि महिलाएं लाल चुनरी ओढ़कर पारंपरिक वेशभूषा में सजी नजर आईं।ब्राह्मण समाज के लोग श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर, जणवा समाज के लोग जणवा मंदिर तथा जाट समाज के ग्रामीण जाटों की बावड़ी पर एकत्रित हुए। रात 9 बजे से ढोल-मादल की थाप पर गैर नृत्य शुरू हुआ, जिसमें पुरुषों ने वृत्ताकार पंक्तियों में पारंपरिक गैर प्रस्तुत की, वहीं महिलाओं ने सिर पर कलश रखकर घूमर नृत्य किया। इस दौरान युवाओं द्वारा की गई आतिशबाजी से आसमान रंगीन रोशनी से जगमगा उठा और पूरा गांव दिवाली जैसा दिखाई देने लगा

तलवारबाजी और नेजा परंपरा बनी आकर्षण

गैर नृत्य के बाद युवाओं ने तलवारबाजी और आग के गोलों के करतब का प्रदर्शन किया, जिसे देखकर दर्शक रोमांचित हो उठे। वहीं नेजा परंपरा भी आकर्षण का केंद्र रही। इस दौरान महिलाएं आक की हरी टहनियां लेकर कतार में खड़ी हो जाती हैं और पुरुष उनके बीच से गुजरते हैं। मान्यता है कि इस परंपरा से गुजरने वाले पुरुष पूरे वर्ष रोग मुक्त रहते हैं।

459 वर्षों से निरंतर चली आ रही रुण्डेड़ा की यह परंपरा आज भी मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।

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