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खीमाराम मेवाडा
*बिपरजॉय की काली रात: तबाही का मंजर आज भी तखतगढ़ के सीने में जिंदा
सरकार का सम्बल अब तक गायब क्या पीड़ितों की पीड़ा सरकारी फाइलों में हमेशा के लिए दफन हो चुकी है?
तखतगढ़ 19 (खीमाराम मेवाडा) 3 वर्ष पूर्व 18 जून 2023 और 10 जुलाई की वह काली रात जब भी मानसून का दौर शुरू होता है तो कस्बेवासियों की रूह कांपने लग जाती है। जब विनाशकारी चक्रवात बिपरजॉय चक्रवात ने तखतगढ़ को जलप्रलय में बदल दिया था। आधी रात को गरजती हवाओं और मूसलाधार बारिश के बीच लोग अपने घरों की छतों पर खड़े होकर पानी का बढ़ता स्तर देख रहे थे—और देखते ही देखते चारों तरफ घर, दुकानें और सपने सब पानी में डूब गए। उसे दरमियां जिसकी शादी थी उसका तो शादी से सप्ताह भर पहले ही जड़ से आशियाना उजड़ गया था।
खारचियावास, महावीर बस्ती, डाकलो का वास, रामकावावास से लेकर जालोर चौराहे और पुलिस थाने तक का इलाका जलसमाधि में बदल गया था। लोग अपने बच्चों को कंधों पर उठाकर सुरक्षित स्थानों की तलाश में भाग रहे थे।
बुजुर्गों की आँखों में भय, महिलाओं की चीखें और अंधेरे में बहता सामान—उस रात का हर दृश्य आज भी लोगों की स्मृतियों में जख्म बनकर दर्ज हो चूके है। और सबसे बड़ा आघात व्यापारियों को झेलना पड़ा। सुबह जब पानी उतरा, तो दुकानों में सारा सामान सड़ चुका था, कीचड़ में दबे कागजात और बर्बाद पूंजी देखकर कई लोगों की आंखों से आंसू रुक नहीं पाए। करोड़ों रुपये का नुकसान झेल चुके व्यापारियों का कहना है—
“तूफ़ान ने जो लूटा, उससे बड़ा घाव सरकार की बेरुखी ने दिया।”
आपदा के बाद नेताओं और अधिकारियों का तांता जरूर लगा। सांसद, विधायक, जिला प्रशासन और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने दौरे किए, कैमरों के सामने संवेदना जताई और राहत का भरोसा दिया। पटवार भवन में मुआवजा आवेदन भरवाए गए, सर्वेक्षण की बातें हुईं—लेकिन आज, ढाई साल बाद भी पीड़ितों के हाथ खाली हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राहत और पुनर्वास केवल फाइलों में सीमित रह गया। जिन परिवारों की आजीविका छिन गई, जिन दुकानदारों की पीढ़ियों की पूंजी बह गई, उन्हें अब तक एक रुपये का मुआवजा नहीं मिला।
कस्बेवासियों के शब्दों में —
“प्राकृतिक आपदा ने घर उजाड़े, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने उम्मीदें भी डुबो दीं।”
तखतगढ़ आज भी पूछ रहा है—
क्या आपदा केवल फोटो खिंचवाने और आश्वासन देने का अवसर है?
क्या पीड़ितों की पीड़ा सरकारी फाइलों में हमेशा के लिए दफन हो चुकी है?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या बिपरजॉय की वह काली रात सरकार की संवेदनहीनता का स्थायी प्रतीक बनकर रह जाएगी?




