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सिरोही-शीतला सप्तमी यानी चैत्र कृष्ण सप्तमी मंगलवार 10 मार्च को मनाई जाएगी। इससे एक दिन पहले चैत्र कृष्ण षष्ठी यानी रांधण षठ सोमवार 9 मार्च को मान्य रहेगी।
सिरोही के ज्योतिष एवं वास्तुविद् आचार्य प्रदीप दवे और शीतला माता मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश वैष्णव ने शीतला माता पूजन के शुभ मुहूर्त बताए हैं।
10 मार्च को पूजन का शुभ मुहूर्त प्रातः 04:15 से 09:01 बजे तक, 09:52 से 02:16 बजे तक और सायं 03:44 से 05:12 बजे तक रहेगा।
गोधूलि वेला में सायं 06:32 से रात्रि 09:10 बजे तक भी पूजन श्रेष्ठ माना गया है।
इस बार वीदर (बिच्छुडा) पेटा में होने, मंगलवार के सुषुप्त होने और सप्तमी तिथि पूजन की मान्यता के कारण, सप्तमी तिथि को पूरे दिन पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा।
शीतला माता का महाप्रसाद (भोग) बनाने का शुभ मुहूर्त चैत्र कृष्ण षष्ठी (रांधण षठ) सोमवार 9 मार्च को रहेगा।
प्रातः 06:57 से 08:25 बजे तक, 09:53 से 11:21 बजे तक और मध्याह्न 12:25 से 01:12 बजे (अभिजित मुहूर्त) तक शुभ वेला है।
सायं 04:16 से 06:40 बजे तक भी भोग बनाने के लिए श्रेष्ठ समय बताया गया है।
शीतला माता के पूजन के विशेष नियम
शीतला माता के पूजन के कुछ विशेष नियम हैं। माता को ज्योत नहीं की जाती है और कपूर या अगरबत्ती नहीं जलानी चाहिए।
दही, मट्ठा, छाछ आदि खाने-पीने की सामग्री माताजी के सामने प्रसाद के रूप में चढ़ाई जाती है। इन सामग्रियों को माताजी के सिर पर गिराना या ढोलना नहीं चाहिए। परिवार की सुरक्षा के लिए श्रीफल (नारियल) हमेशा अखंड चढ़ाया जाता है, अतः इसे तोड़कर नहीं चढ़ाना चाहिए।
श्रीफल पर यथाशक्ति भेंट रखकर माताजी को अर्पण करने से समृद्धता बढ़ती है और अकाल मृत्यु का नाश होता है। शीतला माता के हाथ में झाड़ू का अर्थ बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना है।
ठंडे भोजन का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो इस मौसम में खाना एक या दो दिन पड़ा रहता है तो खाने पर फफूंद लगनी शुरु हो जाती है। वैज्ञानिक इस फफूंद को “पेनासिलीन” नाम से पुकारते हैं। इस फफूंद को माइक्रोस्कोप द्वारा आसानी से देखा जा सकताइस प्रकार प्राकृतिक रुप से पैदा हुई फफूंद (FUNGUS) शरीर में जाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है। जिससे चेचक, घमोरिया, फोड़े-फुन्सी व गर्मी जनित बीमारियां नहीं होती है। आजकल इस फफूंद के इंजेक्शन बाजार में पेनिसिलिन (P.P.F.) के नाम से उपलब्ध है।
शीतला माता के पूजन का धार्मिक आधार
प्राचीन काल से ऐसी मान्यता चली आ रही है कि शीतला माता व ओरी माता को प्रसन्न करने से चेचक नहीं होती है। इसके लिए होलिका दहन से लेकर शीतला सप्तमी तक अगता पालते हुए माताजी के गीत गाकर, बासोड़े का भोग लगाकर और माताजी की कहानियां-वार्ता सुन कर व सुना कर माताजी को प्रसन्न किया जाता थ।
आज भी माताजी के मंदिर में जाकर शीतला व ओरी माता का पूजन कर बासोड़े का भोग लगाते है तथा जहां पर मंदिर नहीं है, वहां घर में ही पनघट पर शीतला माता व ओरी माता के रुप में दो ईंटें स्थापित कर बासोड़े का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।

