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खीमाराम मेवाडा
ज़िले में बजरी प्रतिबंध बनाम विकास की राजनीति
सवालों के घेरे में प्रशासन और जनप्रतिनिधि
तखतगढ 16 जनवरी (खीमाराम मेवाडा) राज्य सरकार की फाइलों में बजरी खनन पर सख़्त प्रतिबंध दर्ज है, लेकिन पाली ज़िले की धरातल पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। जिले में इस समय सैकड़ों करोड़ रुपये के सरकारी निर्माण कार्य प्रगति पर हैं। जिस मे सीसी सड़कें, पुल-पुलिया, सरकारी भवन, ड्रेनेज और ग्रामीण-शहरी विकास योजनाएं।
इन सभी कार्यों की बुनियाद में एक ही सामग्री सबसे अहम है बजरी।
सवाल सीधा है
जब बजरी पर प्रतिबंध है, तो पाली में विकास की यह इमारत किस बजरी पर खड़ी हो रही है।
विकास के नाम पर चुप्पी क्यों?
पाली ज़िले में दिन-रात डंपरों से बजरी सरकारी कार्य स्थलों तक पहुँच रही है। यह सब प्रशासन की नज़रों के सामने हो रहा है। इसके बावजूद न तो खनिज विभाग कोई स्पष्ट जानकारी देता है और न ही जिला प्रशासन सार्वजनिक रूप से जवाबदेह दिखाई देता है। तो क्या यह महज़ संयोग है कि आम नागरिक बजरी ले जाए तो कार्रवाई किसान ट्रैक्टर चलाए तो जुर्माना लेकिन सरकारी ठेकेदारों के डंपर बेरोकटोक सरपट दौडते रहेगे
जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल
विकास कार्यों के शिलान्यास और उद्घाटन में आगे रहने वाले जनप्रतिनिधि इस सवाल पर खामोश क्यों हैं। क्या उन्होंने कभी विधानसभा, जिला विकास समिति या प्रशासनिक बैठकों में पूछा कि बजरी वैध रूप से कहाँ से आ रही है। क्या इसके लिए कोई विशेष अनुमति दी गई है। यदि हां, तो वह अनुमति आम जनता के लिए क्यों नहीं जनता यह जानना चाहती है कि क्या विकास की राजनीति में नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है।
खनिज विभाग—निगरानी या मिलीभगत
पाली जिले का खनिज विभाग इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा सवालों के घेरे में है। इतनी बड़ी मात्रा में बजरी की खपत बिना विभाग की जानकारी के संभव नहीं है। ऐसे में दो ही स्थितियां बचती हैं।
विभाग को सब पता है, लेकिन वह कार्रवाई नहीं कर रहा या फिर नियमों की आड़ में किसी “विशेष व्यवस्था” के तहत सब कुछ चल रहा है
दोनों ही स्थितियां जनहित के खिलाफ हैं।
टेंडर नीति भी कटघरे में
सरकार ऐसे टेंडर जारी कर रही है, जिनमें बजरी अनिवार्य सामग्री है, लेकिन उसकी वैधानिक उपलब्धता को लेकर कोई पारदर्शी नीति नहीं है।
यह स्थिति प्रशासनिक भ्रम नहीं, बल्कि नीति और नीयत दोनों पर सवाल खड़े करती है।
जनता पूछ रही है— जिम्मेदार कौन
पाली जिले की जनता का स्पष्ट
कहना है।बजरी का स्रोत सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता किस आदेश या अनुमति के तहत सरकारी कार्यों में बजरी उपयोग हो रही है। क्या इस पूरे सिस्टम की कभी स्वतंत्र जांच होगी। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक यह धारणा मज़बूत होती जाएगी कि
कानून काग़ज़ों में है,
विकास ठेकेदारों के नियमों से हो रहा है।
पाली ज़िले में बजरी का मुद्दा अब सिर्फ खनिज का नहीं रहा, यह प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक जवाबदेही और समान कानून व्यवस्था की अग्निपरीक्षा बन चुका है।
