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जोधपुर;-स्थाई लोक अदालत जोधपुर महानगर ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पंजाब नेशनल बैंक और केनरा एचएसबीसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया है कि बीमाधारक की मौत के बाद उसके बेटे से बकाया होम लोन की वसूली नहीं की जाए और लोन के एवज में जमा किए गए मूल दस्तावेज वापस किए जाएं।इससे पहले पक्षकारों के बीच सुलह वार्ता असफल रहने के बाद दोनों पक्षों की बहस सुनी गई। इसके बाद लोक अदालत के अध्यक्ष सुकेश कुमार जैन और सदस्य माणकलाल चांडक की पीठ ने जन उपयोगी सेवा प्रकरण पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
दरअसल, जोधपुर के पूंजला किर्ती नगर सेक्टर सी निवासी प्रार्थी रितेश सोलंकी (पुत्र स्व. राजेश्वर सोलंकी) ने विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत लोक अदालत में प्रार्थना पत्र दायर किया था। रितेश के पिता राजेश्वर सोलंकी ने पंजाब नेशनल बैंक, सोजती गेट शाखा जोधपुर से 17 दिसंबर 2021 को 14 लाख 48 हजार 614 रुपये का होम लोन लिया था। इसके अलावा 3 लाख 39 हजार 381 रुपये का टॉप-अप लोन भी लिया गया था।
होम लोन लेते समय बैंक ने लोन सिक्योरिटी के लिए बीमा पॉलिसी लेने का सुझाव दिया था, जिसमें बीमाधारक की मृत्यु होने पर बकाया ऋण माफ होने का प्रावधान था। राजेश्वर सोलंकी ने लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर 58 हजार 614 रुपये प्रीमियम भी जमा करवाए थे। 3 अगस्त 2024 को राजेश्वर सोलंकी का देहांत हो गया।
बीमा कंपनी ने क्लेम क्यों खारिज किया
केनरा एचएसबीसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी ने बीमा क्लेम खारिज करते हुए कहा कि बीमाधारक ने 15 दिसंबर 2021 को प्रपोजल फॉर्म भरते समय अपनी पुरानी बीमारियों को छिपाया था। कंपनी ने तर्क दिया कि राजेश्वर सोलंकी को 2003 और 2015 में दो बार हार्ट अटैक हो चुका था और 2016 में एंजियोप्लास्टी करवाई गई थी, जिसमें स्टेंट लगाया गया था।
बीमा कंपनी ने एम्स अस्पताल जोधपुर की डेथ समरी का हवाला देते हुए कहा कि इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि बीमाधारक को वर्ष 2003 और 2015 में दो बार हार्ट अटैक आ चुका था। उन्हें CAD (Coronary Artery Disease) और ACS (Acute Coronary Syndrome) की समस्या थी। बीमा कंपनी का तर्क था कि जब बीमाधारक से पूछा गया कि क्या पिछले पांच वर्षों में किसी चिकित्सक से उपचार कराया या कोई जांच करवाई है, तो उन्होंने “No” लिखा था।
बीमा संविदा “Utmost good faith” (पूर्ण सद्भावना) पर आधारित होती है, इसलिए महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने के कारण क्लेम खारिज किया गया।
पंजाब नेशनल बैंक की कोशिश बकाया वसूली की
पंजाब नेशनल बैंक ने कहा कि राजेश्वर सोलंकी ने होम लोन लेते समय अपने मकान के मूल दस्तावेज बैंक के पास जमा किए थे। ऋण की किश्तों की अदायगी समय पर की जाती रही, लेकिन उनकी मौत के बाद किश्तें जमा नहीं हुई, जिससे दोनों लोन खातों में काफी बड़ी राशि बकाया हो गई है।
लोक अदालत का निर्णयः पत्रावली में प्रपोजल फॉर्म ही नहीं
अध्यक्ष सुकेश कुमार जैन और सदस्य माणकलाल चांडक की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि पत्रावली में ऐसा कोई प्रपोजल फॉर्म नहीं है, जिसमें बीमाधारक से उसकी पुरानी बीमारी के बारे में प्रश्न पूछे गए हों और उसने गलत जवाब देकर हस्ताक्षर किए हों। प्रार्थी की ओर से तर्क दिया गया कि बीमाधारक की बीमारी के दस्तावेज उन्होंने स्वयं प्रदान किए थे, तथ्यों के छिपाव का उनका कभी आशय नहीं था।
लोक अदालत ने कहा, “बीमा पॉलिसी लेते समय बीमा कंपनी ने बीमाधारक की स्वास्थ्य जांच भी नहीं करवाई थी। बीमाधारक द्वारा हस्ताक्षरित प्रपोजल फॉर्म और पूछे गए प्रश्नों के गलत उत्तर के अभाव में प्रार्थी का क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।”
बैंक-बीमा कंपनी को दिया एक महीने का समय
लोक अदालत ने प्रार्थी रितेश सोलंकी का प्रार्थना पत्र स्वीकार कर बैंक को आदेश दिया कि बीमाधारक के देहांत के बाद उससे बकाया ऋण की वसूली नहीं की जाएगी। साथ ही लोन लेते समय सिक्योरिटी के तौर पर दिए गए दस्तावेज प्रार्थी को लौटाए जाएं। प्रार्थी 5,000 रुपये परिवाद व्यय के रूप में प्राप्त करने का हकदार होगा और इस आदेश की पालना के लिए बैंक और बीमा कंपनी को एक माह का समय दिया जाता है।
