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जोधपुर-राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने नाबालिग सगी बेटी से रेप के मामले में पिता (52) को आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है। जो डेढ़ साल से बेटी से रेप कर रहा था। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया कि यह केवल एक दोषी की अपील को खारिज करना नहीं है। यह समाज की नैतिक चेतना और बाल गरिमा की रक्षा का प्रश्न है।
कोर्ट ने राजस्थान सरकार को पीड़िता को 7 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश भी दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के 13 अक्टूबर 2023 के फैसले को पूरी तरह सही ठहराते हुए आरोपी पिता को दोषी माना।
दरअसल, मां के दूसरी जगह चले जाने के बाद पीड़िता पिता के साथ अकेली रहती थी। पिता इसी का फायदा उठाकर डेढ़ साल तक रेप करता रहा। पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान पीड़िता ने अपनी आपबीती चचेरी बहन को बताई। चचेरी बहन की सलाह पर पीड़िता ने सबूत जुटाने की ठानी। पिता ने दोबारा घिनौनी हरकत की तो मोबाइल को खिड़की के पास छिपाकर वीडियो बना लिया। इस वीडियो को बहन और चचेरे भाई को भेजने के बाद 27 मार्च 2023 को एफआईआर दर्ज कराई गई।
वकील ने तर्क दिया कि पिता संबंध बनाने में अक्षम
पिता के वकील ने हाईकोर्ट में दावा किया कि आरोपी पिता शारीरिक रूप से संबंध बनाने में अक्षम है। वकील ने यह भी तर्क दिया कि पीड़िता के चचेरे भाई ने ‘आटा-साटा’ प्रथा के तहत जल्दी शादी करवाने के लालच में यह झूठी साजिश रची है। वकील ने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत (वीडियो) की प्रामाणिकता जांचने के लिए कोई एफएसएल रिपोर्ट नहीं होने के कारण उसे वैध सबूत नहीं माना जा सकता।पवित्र और प्राकृतिक रिश्ते का निंदनीय विश्वासघात
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के तर्कों को खारिज करते हुए वीडियो साक्ष्य को प्रामाणिक माना और पिता के कृत्य पर बेहद सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने फैसले में लिखा- आरोपी पीड़िता का जैविक पिता था। वही व्यक्ति जिसे कानून और प्रकृति द्वारा उसकी शारीरिक और भावनात्मक भलाई की रक्षा, पोषण और सुरक्षा करने का कर्तव्य सौंपा गया था।
उस पवित्र दायित्व का निर्वहन करने के बजाय, उसने अपनी नाबालिग बेटी की मासूमियत का शोषण करने के लिए अपने अधिकार और प्रभुत्व की स्थिति का दुरुपयोग किया। इस तरह का आचरण एक पिता और बेटी के बीच सबसे पवित्र और प्राकृतिक रिश्ते का पूर्ण और निंदनीय विश्वासघात है।
“मानवीय गरिमा के मूल पर प्रहार”
यौन अपराधों की गंभीरता को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा, “यौन अपराध, विशेष रूप से बच्चों के खिलाफ किए गए अपराध, ऐसी चोट पहुंचाते हैं, जो शारीरिक कृत्य की तात्कालिकता से कहीं आगे तक जाती है। यह नुकसान केवल शारीरिक उल्लंघन तक सीमित नहीं है; यह पीड़िता के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक ताने-बाने में गहराई तक प्रवेश करता है। विश्वास को नष्ट करता है। सुरक्षा को अस्थिर करता है। मानवीय गरिमा के मूल पर प्रहार करता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून पुनर्वास या सुधार की आड़ में ऐसे कृत्यों को माफ नहीं करता है और न ही कर सकता है। कोर्ट ने कहा- ऐसी नैतिक गिरावट के प्रति दिखाई गई कोई भी रियायत या अनुचित सहानुभूति न केवल न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास को कम करेगी, बल्कि बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए अदालतों पर डाले गए संवैधानिक और वैधानिक कर्तव्य की विफलता के समान होगी।
“क्या केवल बेटी होना ही मेरा दोष है?”
कोर्ट ने श्लोक “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ” का उल्लेख करते हुए समाज की चेतना को झकझोरने वाली मार्मिक टिप्पणी की। फैसले में लिखा- “आज भी वातावरण में करुण पुकारों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। इस समाज की अनेक बेटियां भीतर ही भीतर पीड़ा सहते हुए जीवन व्यतीत कर रही हैं।
समाचारों की सुर्खियां फिर किसी अस्मिता के रौंदे जाने की कथा कहेंगी, किसी मासूम के रक्त से समाज का माथा पुनः कलंकित होगा। और वह अबोध प्रश्न फिर हवा में तैरता रहेगा-‘मेरा अपराध क्या था? क्या केवल बेटी होना ही मेरा दोष है?’ जब सभ्यता के आवरण में छिपी दरिंदगी खुलेआम विचरती हो, जब मानवता का चेहरा ओढ़े भेड़िए निर्भीक घूमते हों, तब नारी के लिए जीवन का प्रत्येक कदम भय से घिर जाता है।
कोर्ट ने सवाल किया- कब तक उसकी गरिमा यूं ही तार-तार होती रहेगी? यह केवल एक पीड़िता की वेदना नहीं, बल्कि समूचे समाज की अंतरात्मा पर लगा प्रश्न है- क्या हम वह वातावरण निर्मित कर पाएंगे। जहां बेटी होना अपराध नहीं, सम्मान का प्रतीक होगा?”
