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बाली उपखण्ड के भंदर गांव में आयोजित मेले में एक अनूठी परंपरा निभाई जाती है। यहां होली के तीसरे दिन एक व्यक्ति को इलोजी लोक देवता के रूप में सजाया जाता है। इस जीवित इलोजी को पांच दिन तक विशेष भोजन कराया जाता है।
धुलंडी की शाम को बैंड-बाजों के साथ जीवित इलोजी की बांदोली निकाली गई थी
इस मेले में परंपरा के चलते इलोजी की साक्षात पूजा की जाती है। गैर समाप्त होने के बाद जीवित इलोजी को खाट पर बिठाया जाता है। सुथार समाज द्वारा बनाई गई इस खाट को चारों दिशाओं में रखा जाता है। फिर पंचतीर्थ मंदिर के बाहर चौहटे पर खाट को तोड़ा जाता है। यह राजस्थान की सबसे बड़ी गैर मानी जाती है।
मेले से पूर्व ग्रामवासियों द्वारा पांच दिन तक उसका विशेष सत्कार किया जाता है। व विशाल मेला आयोजित किया जाता है, जिसमें गांव के युवा और बुजुर्ग पारंपरिक वेशभूषा में गैर नृत्य करते हैं। भंदर गांव की यह गैर न केवल गांव में, बल्कि पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
इस भन्दर ग्राम में चमत्कारी व प्रख्यात इलोजी के इस मेले की विशेषता है कि निसंतान दंपत्ति इलोजी के दर्शन करते हैं तो संतान सुख प्राप्ति होती है वही अविवाहित युवक युवतियां भी दर्शन कर शादी की मन्नत मांगते हैं ऐसी मान्यता है कि अगले मेले के पहले निसंतान दंपति को संतान सुख वह अविवाहित युवक युवतिया वैवाहिक बंधन में बंध जाते हैं इसी के चलते देश के विभिन्न भागों से निसंतान दंपति व अविवाहित युवा भी इस मेले में पहुंचकर इलोजी के दर्शन कर मन्नत मांगते हैं इसी चमत्कार के चलते यह मेला प्रख्यात माना जाता है।
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