PALI SIROHI ONLINE
नगराज वैष्णव
दिनेश वैष्णव ‘देसूरी’ का पद त्याग केवल एक पद से निवृत्ति नहीं है, बल्कि यह समाज सेवा के क्षेत्र में एक नई चेतना और स्वस्थ परंपरा का आह्वान है।
“वैष्णव सेवा vसंस्था नालासोपारा वसई विरार (पालघर)” के माध्यम से उन्होंने जो संदेश दिया है, वह आज के समय में अनुकरणीय है।
किसी भी संस्था में पद प्राप्त करना आसान है, लेकिन उस पद पर रहते हुए निस्वार्थ सेवा करना और कार्यकाल पूर्ण होने पर स्वेच्छा से उसे त्याग देना महानता का परिचायक है। दिनेश वैष्णव ‘देसूरी’ जी ने वैष्णव सेवा संस्था (नालासोपारा वसई विरार) से निवृत्ति लेकर समाज के सम्मुख ‘त्याग और समर्पण’ की एक अनुपम मिसाल पेश की है।
त्याग और निस्वार्थ सेवा का संदेश
अक्सर देखा जाता है कि लोग संस्थाओं में पदों से चिपके रहते हैं, जिससे नए विचारों और युवा ऊर्जा को अवसर नहीं मिल पाता। दिनेश जी ने अपने कार्यकाल को पूर्ण निष्ठा से निभाया और समय आने पर स्वयं पद छोड़कर यह सिद्ध कर दिया कि “पद सेवा का माध्यम है, प्रतिष्ठा का नहीं।” उनका यह कदम दर्शाता है कि एक सच्चा समाजसेवी वही है जो अपनी उपलब्धियों के बाद मार्गदर्शक की भूमिका में आकर दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर दे।
एक स्वस्थ संगठन वही है जहाँ नेतृत्व परिवर्तन सहजता से हो। दिनेश वैष्णव जी द्वारा नई ऊर्जा और नए कार्यकर्ताओं को पदभार सौंपना संस्था के भविष्य को सुरक्षित करने वाला कदम है। इससे न केवल संस्था में नया उत्साह आता है, बल्कि कार्यकर्ताओं में यह विश्वास भी जागता है कि मेहनत और समर्पण को उचित सम्मान मिलता है।
अन्य संस्थाओं के लिए एक सीख
दिनेश जी का यह निर्णय उन सभी सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के लिए एक बड़ी सीख (Message) है जहाँ वर्षों तक एक ही नेतृत्व बना रहता है। उनके इस कार्य से समाज को निम्नलिखित संदेश मिलते हैं:
- समय पर जिम्मेदारी सौंपना: नेतृत्व का हस्तांतरण संस्था को दीर्घायु बनाता है।
- अहंकार का अभाव: पद छोड़ना मानसिक मजबूती और निस्वार्थ भाव का प्रतीक है।
- मार्गदर्शक की भूमिका: निवृत्ति का अर्थ सेवा का अंत नहीं, बल्कि एक अनुभवी सलाहकार के रूप में नई भूमिका की शुरुआत है।
दिनेश वैष्णव ‘देसूरी’ जी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि समाज सेवा के लिए पद पर होना अनिवार्य नहीं है, बल्कि सेवा की भावना हृदय में होनी चाहिए। समाज को आज ऐसे ही निष्काम कर्मयोगियों की आवश्यकता है जो व्यक्तिगत मोह से ऊपर उठकर सामूहिक हित और संस्था की उन्नति को प्राथमिकता दें।
