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बीजापुर में स्थित 1700 वर्ष प्राचीन राता महावीर स्वामी जैन तीर्थ—इतिहास, आस्था और अद्भुत स्थापत्य का संगम

Pintu Aggarwal by Pintu Aggarwal
March 30, 2026
in Local
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बीजापुर में स्थित 1700 वर्ष प्राचीन राता महावीर स्वामी जैन तीर्थ—इतिहास, आस्था और अद्भुत स्थापत्य का संगम

PALI SIROHI ONLINE

बाली उपखण्ड के बीजापुर क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला की तलहटी में स्थित श्री हथुण्डी राता महावीर स्वामी जैन मंदिर अपनी प्राचीनता, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक गौरव के लिए विशेष पहचान रखता है। यह पवित्र तीर्थ बीजापुर से लगभग चार किलोमीटर दूर स्थित है और करीब 1700 वर्ष पुराना माना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, प्राचीन काल में यहां हस्तिकुण्डी नामक समृद्ध नगरी थी, जो राष्ट्रकूट वंश की राजधानी रही। सोहनलाल पटनी द्वारा लिखित “हस्तिकुण्डी का इतिहास” के अनुसार विक्रम संवत 1080 में मुहम्मद गजनवी ने सोमनाथ जाते समय नाडोल के शासक रामपाल चौहान और बाद में हस्तिकुण्डी के शासक दत्तवर्मा राठौड़ से युद्ध किया। इस दौरान इस समृद्ध नगरी को लूटा गया और मंदिरों व देव प्रतिमाओं को क्षति पहुंचाई गई। राता महावीर तीर्थ भी इस आक्रमण से अछूता नहीं रहा, लेकिन जैन धर्मावलंबियों ने समय-समय पर इसका जीर्णोद्धार करवाकर इसकी गरिमा को पुनः स्थापित किया।

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार मुनि जिन विजय जी के अनुसार, यह मंदिर राज्य के 556 जैन मंदिरों में सबसे प्राचीन माना जाता है। मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 621 में आचार्य सिद्धी सूरीश्वर के उपदेश से वीर देव द्वारा करवाया गया था।

हस्तिकुण्डी नाम के पीछे भी रोचक मान्यता जुड़ी है। कहा जाता है कि राष्ट्रकूटों के साम्राज्य का विस्तार दूर-दूर तक था और यहां हाथियों का विशेष महत्व रहा। यही कारण है कि राता महावीर स्वामी की प्रतिमा के नीचे अंकित सिंह के लांछन का मुख हाथी के समान दिखाई देता है, जिससे इस नगरी का नाम हस्तिकुण्डी या हथुण्डी पड़ा।

“आठ कुआ नव बावड़ी, सोलह सौ पणिहारिन” जैसे प्रचलित स्लोगन से भी इस नगरी के वैभव और समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।

मंदिर का जीर्णोद्धार विक्रम संवत 2001 में प्रारंभ होकर संवत 2006 में पूर्ण हुआ, जिसकी प्रतिष्ठा आचार्य श्री विजय वल्लभ सूरीश्वर जी द्वारा की गई। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने महावीर यक्ष का छोटा मंदिर स्थित है, वहीं मुख्य मंदिर में 24 देव कुलिकाएं स्थापित हैं। प्रवेश करते ही भव्य रंगमंडप दिखाई देता है, जिसमें मांतग यक्ष और सिद्धायिका देवी की कलात्मक प्रतिमाएं स्थापित हैं।

मंदिर के गर्भगृह में मूलनायक भगवान महावीर की अद्वितीय प्रतिमा विराजमान है, जिस पर लाल विलेप चढ़ा हुआ है। यह प्रतिमा ईंट, चूना और मिट्टी से निर्मित होने के कारण विशेष महत्व रखती है। इसके प्रभामंडल के दोनों ओर सिंह तथा मध्य में हाथी का मुख अंकित है, जो इसे विशिष्ट बनाता है।

मंदिर परिसर में एक भूमिगत मंदिर भी स्थित है, जहां विशाल लाल वर्ण की भगवान महावीर की प्रतिमा स्थापित है। प्रदक्षिणा पथ में यक्षों की प्रतिमाएं और एक कक्ष में यशोभद्र सूरीश्वर, बालिभद्राचार्य सहित अन्य आचार्यों की प्रतिमाएं अंकित हैं।

श्री अरुण विजय की प्रेरणा से यहां “श्री महावीर वाणी समवसरण जैन मंदिर” का निर्माण भी किया गया है, जो पूरे राजस्थान में अद्वितीय माना जाता है। मंदिर परिसर में धर्मशाला, यात्री भवन, आयम्बिल भवन, पुस्तकालय, भोजनशाला, जैन पेढ़ी, गौशाला और कबूतर चबूतरा जैसी आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।

यहां हर वर्ष चैत्र शुक्ल दशमी को भव्य मेला आयोजित होता था, जिसमें विशेष रूप से आदिवासी समुदाय की भागीदारी रहती थी। हालांकि, वर्तमान समय में यह परंपरागत मेला धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर पहुंचता जा रहा है।

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