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रेवदर-रेवदर के नंदगांव में ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ में धर्म और अध्यात्म का माहौल बना हुआ है। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वतीजी महाराज ने प्रवचन में गोसेवा, धर्मरक्षा, न्याय, त्याग और मानव जीवन की सार्थकता पर शास्त्रीय प्रसंगों के माध्यम से प्रकाश डाला।
जगद्गुरु ने महाकवि कालिदास के ‘रघुवंश’ में वर्णित राजा दिलीप और नंदिनी गौ के प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गोसेवा केवल भोजन और संरक्षण तक सीमित नहींहै, बल्कि इसमें समर्पण, कर्तव्य और जरूरत पड़ने पर स्वयं को अर्पित करने की भावना भी शामिल है।
उन्होंने बताया कि राजा दिलीप ने नंदिनी की रक्षा के लिए अपने प्राण तक समर्पित करने का संकल्प लिया था। उन्होंने कहा कि जिसकी जिम्मेदारी स्वीकार की है, संकट के समय उसके साथ खड़ा होना ही धर्म है।
निर्बल की पुकार अनसुनी न हो, यही न्याय
रामराज्य का प्रसंग सुनाते हुए जगद्गुरु ने न्याय की व्यापक अवधारणा समझाई। उन्होंने कहा कि आदर्श शासन वही है, जहां किसी निर्बल जीव की पुकार भी अनसुनी न हो।
वसिष्ठ-विश्वामित्र प्रसंग के माध्यम से उन्होंने बाहुबल से ऊपर ब्रह्मबल की महत्ता बताई। उन्होंने ज्ञान, तप, सत्य और संयम को वास्तविक शक्ति बताया।
‘मनुष्य जीवन रूपी पारसमणि’ का संदेश
प्रवचन के दौरान मनुष्य जीवन को पारसमणि बताते हुए जगद्गुरु ने कहा कि व्यक्ति धन, पद और प्रतिष्ठा रूपी ‘लोहा’ जुटाने में अपना पूरा जीवन लगा देता है। लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव पर उसे इसकी वास्तविक सार्थकता का अहसास होता है।
उन्होंने संदेश दिया कि “लोहा जुटाते-जुटाते पारसमणि हाथसे न निकल जाए; संसार जुटाते-जुटाते मनुष्य-जीवन व्यर्थ न चला जाए।”
हजारों गोभक्त रहे मौजूद
कार्यक्रम में ऋषिचैतन्यजी महाराज, चेतननाथजी महाराज, श्रीराम कथा मनोरथी केवलाजी कस्तुराजी पुरोहित पालड़ी, प्रवीणजी सांवताजी पुरोहित पालड़ी, देवाराम जागरवाल, रघुनाथसिंह राजपुरोहित, बलवंतराज अणखोल, सीईओ आलोक सिंहल, भरतसिंह बसंत, देवाराम डिगारी, सुरेश कुमार नून, कैलाश सांथू, मंगलसिंह बागरा और बिहारीलाल बसंत सहित हजारों गोभक्त उपस्थित रहे।


