पालड़ी आर में संत नगाजी महाराज का वार्षिक मेला संपन्न

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गणेश परमार गोयली

पालड़ी आर में संत नगाजी महाराज का वार्षिक मेला संपन्न

गोयली| समीपवर्ती गांव पालड़ी आर में संत श्री शिरोमणि नगाजी महाराज का वार्षिक मेला संपन्न हुआ।

भक्त नीमाराम मेघवाल ने बताया कि संत नगाजी महाराज का जन्म 05 फरवरी माघ सुदी
दूज शनिवार 1544 विक्रम सवंत 1600 को परमार वंश में हुआ। इनके माता का नाम श्रीमती कोकु बाई व पिता का नाम श्री सवाजी तथा पत्नी का नाम राधा गाँव फलवदी में मेघवाल जाति में जन्म हुआ था। बचपन से भगवान महादेव जी व द्वारकाधीश को अपना आराध्य देव मानते थे। उन्होंने कई बार गायों को चारा चराते हुए कृष्ण भगवान से बातें करना व साथ-साथ रहते थे। इससे कृष्ण-सुदामा की तरह प्रेम बढ़ता गया। एक समय गाँव अणगोर में गंगाथाली मे गये जब किसी भक्त को काँचे की थाली में भोजन दिया व नगाजी महाराज को पीतल की थाली में भोजन दिया तब नगाजी बोले कि इनको काँचे की थाली में और मुझे पीतल की थाली में भोजन क्यों दिया
म्यानदास बोले ये मेरे शिष्य है तो नगाजी बोले मुझे भी अपना शिष्य बना दो तो संत गुरु म्यानदास ने उनको भी अपना शिष्य बना दिया और गुरु शिक्षा दी। तब से नगाजी महाराज ईश्वर भजन में लगे और ऐसे‌ करते करते ईश्वर भक्ति करते रहते थे।

नगाजी महाराज द्वारा दिये गए परसे

सिरोही के महाराजा फलवदी गाँव में प्रत्येक सोमवार को वैद्यनाथ महादेव मंदिर में दर्शन करने जाया करते थे। एक दिन की बात है नगाजी महाराज भी वेद्यनाथ महादेव मंदिर में पूजा करने गये और पूजा-पाठ महाराजा से पहले किया, तो पुजारी नाराज हो गये और नगाजी को मना किया ओर कहां कि तुम जाति से मेघवाल हो, ओर हमसे पहले पूजा नहीं कर सकते। तब से मंदिर के दरवाजे बंद हो गये। एक सप्ताह बाद दरबार दर्शन करने मंदिर गये तब मंदिर पर ताला लगा हुआ था। तब दरबार ने पुजारी से पूछा कि मंदिर पर ताले क्यों लगे हुए है, तब पुजारी ने बोला हमने नगाजी मेघवाल को पूजा करने से मना किया था तब से ताले लगे हुए है बहुत कोशिश की परन्तु ताले नहीं खुले, तो दरबार ने सैनिको को भेजा की नगाजी को बुलाकर लाओ। तब सैनिक नगाजी के पास पहुँचे तो नगाजी ने कहाँ कि मुझे बुखार आया हुआ है मैं नहीं आ सकता तब सैनिक वापस चले गये और सैनिको ने नगाजो द्वारा कई बातें दरबार को बता दी तब दरबार ने कहाँ उनको खटीया समेत लेकर आओ। सैनिक वापस नगाजी के पास आए और दरबार का आदेश नगाजी को बता दिया, तब नगाजी ने कहाँ आप चलो मैं आता हूँ। रास्ते में नगाजी लकडियो का गट्टर बनाने लगे
सैनिक उन्हें देख रहे थे नगाजी वो लकडियो का गढ़टर सिर पर रख कर सैनिको के पीछे-पीछे चलने लगे तभी मंदिर से थोडी दुर नगाजी सैनिको से एकदम आगे चलने लगे और अचानक चमत्कार हुआ और लकडियो का गट्टर घास के भारे में बदल गया यह देख सभी सैनिक नगाजी के चरणों में गिर गये और भाग कर दरबार को सारी बात बताई नगाजी मंदिर मे दरबार के पास पहुँचे दरबार बोले नगाजी जब तुम यहाँ आये थे और तुम्हारे कहने से मंदिर के दरवाजे बंद हो गये है तब नगाजी ने कहा यदि मेरे कहने से बंद पड़े है तो ताले खुल जाये तभी घडाक से ताले टूट गये और दरवाजे खुल गये ओर अन्दर देखा तो पूजा की हुई थी दरबार ने दर्शन किये इन सब कारणों से दरबार के मन मे नगाजी कि प्रति प्रेम बढ गया दरबार ने नगाजी को अपना गुरु बनाया। संतो के मुख से निकले हुए शब्द कभी भी असत्य नहीं होते वो परचा एक भेदभाव मिटाने का संकेत देता है।

परचा नंबर 2

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आन एक समय जब राजा (दरबार) और नगाजी दोनों वेद्यनाथजी फलवदी से सिरोही आ रहे थे तो रास्ते में उनको प्यास लगी तो राजा ने कहा कि कही पानी हो तो लाओ नगाजी ने यहाँ पास में ही मेरे गुरु महाराज अणगोर गाँव में रहते है तो दरबार ने सैनिको को गुरु महाराज के पास भेजा।

एक बार सिरोही दरबार गंगाजी गये तब वहाँ से अपने साथ गंगाजल व इत्र साथ लेकर आए तथा सैनिको को दरबार ने गंगाजल व इत्र नगाजी को देने के लिए भेजा तब नगाजी ने गंगाजल व इत्र को गोबर की उकल्ली में डाल दिया जिससे दरबार के सैनिक नाराज हो गये ओर यह बात दरबार को बताई तो दरबार स्वयं पालडी आए और नगाजी को पूछा मैं गंगाजी से आपके लिए गंगाजल व इत्र लाया ओर आपने उसे उकल्ले मे डाला ऐसा क्यों किया तब नगाजी ने बोला कि मेरे भगवान तो इस उकल्ले में है मैं इस गंगाजल और इत्र का क्या करुगा अराध्य को भेट कर दिया तब दरबार ने सैनिको को बुलाकर उकल्ली हटवाई तो ग्यारस के दिन ताँबे के पाठ सहित ठाकुरजी (द्वारिकाधीश) सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ निकली इनमे से आधी मूर्तियाँ व पाठ सिराही दरबार में लेकर गये आधी मूर्तिया और नया पाठ (लकडी) का बनाकर दिया।
जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिये ज्ञान, मोल को तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान

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परचा नंबर 3

एक बार नगाजी सिरोही दरबार को केसर विलास में मिलकर आ रहे थे। तब रास्ते में मृत पशु देखा तो नगाजी उस मृत पशु की माटी लेने लगे। तब वहाँ से गुजर रहे सैनिको ने नगाजी को माटी लेते हुए ऐखा तो सैनिको ने यह बात दरबार को बताई तो दरबार ने सैनिको को नगाजी को लेने हेतु भेजा।

परचा नंबर 4

कार्तिक पुनम के दिन 1670 वि. संवत मे नगाजी व उनकी पत्नी राधा ने जीवित समाधि ली उसी दिन सिराही के बाहरीघाटे में पालडी (आर) क रावल समाज के नयाराम जी को पति-पत्नि मिलें और उससे नगाजी ने बोला कि पालडी गाँव में नदी के किनारे मेला लगा हुआ है। नगाजी ने पत्थर इक्ट्ठे करके गटरी बाधकर दी और बोला कि वहाँ मेले में बाँट देना जब नयारामजी पालडी आये तो वहाँ मेला लगा हुआ था तब उन्होने लोंगो से पूछा की मेला किस बात का लगा है तो लोगो ने बताया कि नगाजी नगाजी महाराज व उनकी पत्नी राधा ने जीवित समाधि ली है तब नयारामजी ने बताया कि यह नहीं हो सकता क्योंकि मुझे नगाजी व उनकी पत्नी दोनों बाहरीघाटा में मिले ह और उन्होने यह पोटली दी है कि मेले में बाँट देना पत्थर की पोटली को खोला तो उसमें से मिचरी बनी मिलो तब उसको पूरे मेले मे बाँट दिया तब भी वो कम नहीं पड़ी जहाँ नगाजी बाहर निकले थे उस स्थान को बालेश्वर महादेव से जाना जाता है। जहाँ समाधि आज भी पालड़ी आर में मौजूद है।

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