गांवों में मारवाड़ के देशी अंगूर पीलू की बहार, पीलू में पानी की मात्रा अधिक होने के कारण लू से बचाता है, पौष्टिक भी

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जालोर।मारवाड़ में गर्मी से बचाव के लिए कई प्राकृतिक संपदा हैं, उन्ही में से एक है पीलू। जिसकी मारवाड़ का मेवा के नाम से पहचान है। ग्रामीण गर्मी के दिनों मं लू से बचाव के लिए इसका अधिक सेवन करते हैं। इन दिनों ग्रामीण अंचलों में पीलू की बहार आई हुई है। इन दिनों क्षेत्र में जितनी तेज गर्मी और लू बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से पीलू और सांगरी भी पक रहे हैं। जाळे व खेजडियां अब लटालूम नजर आने लगी है। ग्रामीण महिलाएं व बच्चे इन्हें सहेज भी रहे हैं। पीलू रसीले होते हैं, जो अधिक गर्मी में पक कर तैयार होते हैं। यह पोष्टिक होने के साथ ही इनमें पानी की मात्रा अधिक रहती हैं। जिससे लोग बड़े चाव से पीलू को खाते हैं। ग्रामीणों के मुताबिक गर्मी में पीलू खाने से लू नहीं लगती। गांवों में लोग पीलू को एकत्रित कर उन्हें धूप में सुखाते है। सालभर तक उन्हें काम में लेते हैं।

गर्मी के दिनों में फलता है यह पेड़, रंग बिरंगे पीलू, रसीले और स्वादिष्ट होते हैं

पीलू का पेड़ बेतरतीब तरीके से फैला होता है। इसलिए इसे जाळ कहते हैं। गर्मी में जाळ का पेड़ हराभरा रहता है। ऐसे में यह पेड़ रंगे बिरंगे फलों से लदे हुये हैं। पीलू शुरुआत में हरे रंग के होते हैं और पकने की अवस्था में पीले और फिर लाल हो जाते हैं। गर्मी के दिनों में पकने वाला यह स्वादिष्ट फल लू के बचाव के लिए काफी कारगर माना जाता है।

पीलू बीनने समूह में निकलते हैं लोग ग्रामीण क्षेत्रों में जाळ पर लगे पीलू बीनने के लिए अल सवेरे से ही किशोर-किशोरियों के साथ बड़े बुजुर्ग समूह में निकलते हैं। एकत्रित कर पीलू को सुखाया जाता हैं। जिससे सीजन के बाद भी इनका उपयोग हो सके। पीलू स्वाद में मीठे होते हैं।

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