ईश्वर से बड़ा दर्जा है माँ का,मदर्स डे पर अभिषेक मेवाड़ा ने लिखा आलेख

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ईश्वर से बड़ा दर्जा है माँ का,मदर्स डे पर अभिषेक मेवाड़ा ने लिखा आलेख

बाली। मदर्स डे पर मुंडारा निवासी अभिषेक मेवाड़ा ने मदर्स पर आलेख लिखा है जो हर किसी को पसन्द कर रहा है।
अभिषेक मेवाड़ा ने लिखा की जन्म देने वाली एक माँ है अर्थात् जीवन की देवी और ममता की तस्वीर है। माँ की भावना को कोई नहीं समझ सकता। एक माँ ही माँ की भावना समझ सकती है किन्तु माँ सभी के हृदय के भाव को समझ लेती है। इसलिए माँ को ईश्वर से भी बड़ा दर्जा दिया जाता है। “त्वमेव माता च पिता” माँ सर्वप्रथम पूजनीय है। माँ के हृदय को कष्ट पहुँचाने वाले को भगवान भी माफ नहीं करता। माँ शब्द बोलते ही मुख भर आता है। जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान् होती है। माँ बालक को नौ माह तक कोख में रखकर उसे रक्त पीला-पीलाकर एक नये जीवन देने योग्य बनाती है।


माँ गर्भ में कितना कष्ट उठाती है लेकिन वहीं बालक बड़ा होकर उसे कष्ट देता है फिर भी माँ दर्द को सहन करते हुए भी बालक से स्नेह करती है। यह एक आदर्श माता के लक्षण है। बालक को जन्म देना स्त्री का दूसरा जन्म होता है। बालक व माँ का खून का रिश्ता होता है। जब माँ अपने शिशु को अपना अमृत पिलाती है तो उसके साथ आत्मीय, अटूट रिश्ता जोड़ देती है और शिशु को जो शांति और माता को जो सुख मिलता है उसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता।


संतान माता-पिता के प्रेमवृक्ष का फल-फूल होते है। स्वयं गीले में सो कर अपने बालक को सूखे में सुलाती है और अपना दुःख-दर्द, सुख सुविधा को न्यौछावर कर देती है। माँ जिसकी कोख से सृष्टि का निर्माण होता व प्यार पनपता, जिनकी गोद में जन्म लेने के लिए भगवान भी आतुर होते है। बच्चे के प्रति पिता से बढ़कर माता का स्नेह अत्यधिक होता है और पिता आस लेकर बैठता कि बुढ़ापे की लकड़ी बनेगा। माँ की महिमा आद्वितीय है जिसे कोई उजागर नहीं कर सकता है। माता ने जो दुःख उठाया, अँगुली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा लिखाकर गुणवान बनाया वह ऋण कभी नहीं चुकाया जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस प्रकार माँ अपने कष्ट सहन करते है। उसी तरह एक बच्चे को अपनी माँ की भावना को समझना चाहिए।


माता-पिता अपने बच्चों के बगिया के माली होते है। नौ माह जमीं के अन्दर बीज बोने के पश्चात अंकुर पल्लवित होता है तब अंकुर का रुप धारण कर जमीं से बाहर निकल आता है। वहीं अंकुर को माली के द्वारा वात्सल्य प्रेम, उपजाऊ मिट्टी, उत्तम किस्म की खाद व पानी सींचने है। साथ ही मूक प्राणि व विषैले कीटों से भी रक्षा करते है। तब अंकुर विशाल वट वृक्ष की भाँति बड़ा होकर अपने बगिया के माली को फल-फूल व शीतल छाया इत्यादि प्रदान करता है। एक माँ को अपने बेटे की विनती कि वह अपने बच्चे को जन्म के उपरांत उपजाऊ जमीं, खाद, पानी व सुसंस्कार सींचने रहे क्योंकि बच्चे कोमल अंकुर की तरह होते है जिस ओर मोड़ना चाहते है उस ओर मोड़ सकते है। ताकि कल उठकर देश की कमान उनके हाथों में हो और भविष्य उज्ज्वल हो सके। फौला दी है बाहे, हम चाहे तो पैदा कर सकते है चट्टानों में राहे।
जिसने बिछाये फूल थे, हरदम तुम्हारी राहों में।
उस राहबर की राह के, कंटक कभी बन्ना नहीं।
सलग्न फोटो अभिषेक मेवाड़ा आलेख लिखने वाला