पाली-ऐसा चमत्कारी मंदिर जहां 221 सालों से जल रही अखंड ज्योत

PALI SIROHI ONLINE

पाली के ऐतिहासिक सोमनाथ महादेव के चमत्कारी मंदिर के इतिहास से रूबरू करवाते हैं। करीब 1121 साल पुराने इस मंदिर में पिछले 221 वर्षों से देशी घी की अखंड ज्योत प्रज्जलित हो रही हैं। इस मंदिर पर भी कई विदेशी शासकों के आक्रमण हुए हैं। मंदिर की मूर्तियों को खंडित किया गया। जो आज भी दिखाई देती हैं लेकिन उसके बाद भी यह मंदिर अपने वैभव के साथ खड़ा तथा लोगों की आस्था का केन्द्र बना हुआ हैं।

श्रावण माह में यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की कतार लगती हैं। इतिहासकारों की माने तो 9वीं शताब्दी में सोमनाथ महादेव मंदिर का निर्माण हुआ था। अतीत में इसका नाम सोमेश्वर के नाम से था। इसके अद्भूत स्थापत्य के आधार पर इतिहासकारों तथा पुरातत्व विशेषज्ञों ने इसका निर्माण काल 9वीं शताब्दी में माना।

सोमनाथ महादेव मंदिर पर लगी क्षतिग्रस्त प्रतिमाएं। जो विदेशी आक्रमणकारियों ने खंडित की।
सोमनाथ महादेव मंदिर पर लगी क्षतिग्रस्त प्रतिमाएं। जो विदेशी आक्रमणकारियों ने खंडित की।
वर्ष 1125 में सौराष्ट्र से शिवलिंग लेकर आए थे कुमारपाल


वर्ष 1125 की बात हैं गुजरात जा रहे महमूद गजनवी ने वैभव सम्पन्न पाली को लूटते हुए सोमेश्वर (सोमनाथ) मंदिर में तोड़-फोड़ की, मूर्तियां व शिवलिंग को भी खंडित कर दिया तथा आगे गुजरात तरफ बढ़ गया। सौराष्ट्र सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले की आशंका को देखते हुए गुजरात के राजा कुमारपाल रथ में बैठकर शिवलिंग कर पाली पहुंचे तथा यहां के पल्लीवाल ब्राह्मणों को सौंपा।

सोमनाथ महादेव मंदिर पर तरासी गई प्रतिमाएं। जिसने में से अधिकतर क्षतिग्रस्त हैं।
सोमनाथ महादेव मंदिर पर तरासी गई प्रतिमाएं। जिसने में से अधिकतर क्षतिग्रस्त हैं।
वर्ष 1140 में करवाया मंदिर का जीर्णोद्वार

पाली के ध्वस्त सोमेश्वर महादेव मंदिर का जीणोद्वार कुमारपाल ने वर्ष 1140 में शुरू करवाया। कहते हैं कि रात-दिन निर्माण कार्य चला। सैनिकों ने तेल की घाणी कर मशालें जलाई और कार्य पूर्ण करवाया। यही सैनिक आगे चलकर घांची कहलाएं। जो आज भी सोमनाथ महादेव को अपना इष्ट देव मानते हैं। वर्ष 1152 में सौराष्ट्र से लाया गया शिवलिंग इस मंदिर में स्थापित किया गया। तथा वैशाख शुक्ल 4, संवत 1209 को प्रतिष्ठित किया तथा सोमनाथ महादेव नामकरण किया।

सोमनाथ महादेव मंदिर के शिवलिंग का किया गया शृंगार।
सोमनाथ महादेव मंदिर के शिवलिंग का किया गया शृंगार।
तोप का गोला दाग किया मंदिर का शिखर क्षतिग्रस्त
सन 1298 में गुजरात जाते समय अलाउद्दीन खिलजी ने सोमनाथ महादेव मंदिर के शिखर पर तोप का गोला दाग क्षतिग्रस्त कर दिया था। वर्ष 1315 में रावसिंहा के कार्यकाल में पालीवाल ब्राह्मणों ने मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया तथा मंदिर को शिखर को ईटों से फिर से निर्माण करवाया। वर्ष 1330 में नसीरूद्दीन ने पाली पर हमला कर दिया। मंदिर को बचाने के लिए पल्लीवाल ब्राह्मणों को उसे धन देना पड़ा। वर्ष 1349 में फिरोजशाह जलालुद्दीन ने पाली को लूटा। सोमनाथ मंदिर में दो छोटी मिनारों का निर्माण करवाया। जिसके अवशेष 1947 के बाद नष्ट कर दिए गए। कहते हैं कि वर्ष 1350 में पल्लीवाल ब्राह्मणों के पलायन के बाद नाथ सम्प्रदाय ने मंदिर की व्यवस्था संभाली। वर्ष 1600 में नाथ सम्प्रदाय के महंत भोलानाथ ने पूजा व्यवस्था रावल ब्राह्मण परिवार को सौंपी और समाधि ले ली। सोमनाथ महादेव मंदिर में सन 1800 में घी की अखंड ज्योत शुरू की गई जो आज भी प्रज्जवलित हैं। वर्ष 1970 में राजस्थान के देवस्थान विभाग ने मंदिर की व्यवस्था का जिम्मा लिया।

मंदिर की आकर्षक कलात्मक शैली मोह लेती हैं मन
मंदिर पर नृत्य मुद्राओं वाली काफी प्रतिमाएं हैं। मंदिर का सभगृह 16 आकर्षक कलात्मक खंभों पर टिका हैं। सभा मंडल की छत पर कृष्णलीला में रास करती गोपियां तथा कृष्ण की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के शिखर तथा अन्य जगह पर बनी मूर्तियों में तीक्ष कटिका, नृत्यु मुद्रा, पीन पयोदर, नुकीली नासिका, गठीली मांसल त्वचा पर अलंकरण व आभूषण तीरछे नैन, टेडी भौहे, हंसमुख चेहरा, लहराते टेडे-मेडे वस्त्र दिखते हैं। गर्भगृह में शिवलिंग के साथ पार्वती तथा गणपति की प्राचीन प्रतिमाएं हैं।

नहीं भूला जा सकता पल्लीवाल ब्राह्मणों का बलिदान
कहते हैं कि नसीरूद्दीन ने इस शिवलिंग को तोड़ना चाहा। लेकिन पाली के हजारों पल्लीवाल ब्राह्मण उनसे टकरा गए। जिमसें हजारों पल्लीवाल ब्राह्मणों ने बलिदान देकर मंदिर के गर्भगृह की सभी प्रतिमाओं को बचा लिया। जो मंदिर की सुरक्षा करते हुए शहीद हुए उनकी नौ मन जनैऊ को मंदिर के पास ही एक बावड़ी में डाल कर उसे बंद कर दिया गया। जो आज धौला चौतरा के जूझांरजी के नाम से प्रसिद्ध हैं।